India News: उत्तर प्रदेश के इटावा में एक ऐतिहासिक मजार को लेकर न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है। प्रशासन ने मोहम्मद गोरी के सेनापति शमशुद्दीन की मजार को आरक्षित वन भूमि पर अवैध कब्जा घोषित किया है। न्यायालय प्राधिकृत अधिकारी वन ने इस मामले में मजार को हटाने और बेदखली के आदेश जारी किए हैं। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद यह स्पष्ट हुआ कि मजार सरकारी वन भूमि पर नियम विरुद्ध बनाई गई थी।
64 दिनों की सुनवाई में नहीं मिले ठोस साक्ष्य
अदालत में यह मामला पूरे 64 दिनों तक चला, जिसमें तथ्यों की गहन जांच की गई। मजार पक्ष की ओर से दावा किया गया था कि यह संरचना 832 साल पुरानी है। हालांकि, पक्षकार इस दावे के समर्थन में कोई भी ऐतिहासिक या कानूनी दस्तावेज पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहे। न्यायालय ने पाया कि 1800 वर्गफीट जमीन पर किया गया यह कब्जा पूरी तरह से गैर-कानूनी है और इसे तुरंत खाली करना अनिवार्य है।
गजट और सरकारी दस्तावेजों ने खोली पोल
न्यायालय ने अपने फैसले में वन विभाग के पुराने गजट रिकॉर्ड्स का हवाला दिया है। वर्ष 1916, 1939 और 1946 के आधिकारिक गजट के अनुसार, यह पूरी भूमि आरक्षित वन क्षेत्र के अंतर्गत आती है। भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 20 के तहत आरक्षित भूमि पर किसी भी प्रकार की गैर-वानिकी गतिविधि प्रतिबंधित है। सरकार की हाईपावर कमेटी की अनुमति के बिना यहां कोई भी निर्माण कार्य करना कानून का उल्लंघन माना जाता है।
पक्षकारों को दिए गए पांच बड़े अवसर
न्यायालय ने न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए पक्षकारों को अपनी बात रखने के पर्याप्त मौके दिए। मजार के सदर फजले इलाही को मालिकाना हक के सबूत पेश करने के लिए कुल पांच बार समय दिया गया। फरवरी से शुरू हुई इस प्रक्रिया में पक्षकारों ने बार-बार समय मांगा, लेकिन अंतिम तिथि तक वे कोई भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं करा सके। इसके बाद न्यायालय ने मजार को अवैध घोषित करते हुए कब्जा खाली करने का निर्णय सुनाया।
बीहड़ वाले सैयद बाबा का ऐतिहासिक संदर्भ
लोककथाओं के अनुसार, वर्ष 1194 में मोहम्मद गोरी और राजा सुमेर शाह के बीच भीषण युद्ध हुआ था। उस समय सेनापति शमशुद्दीन इटावा के बीहड़ों से सेना की निगरानी करता था। युद्ध में मारे जाने के बाद उसकी याद में वहां एक मजार स्थापित कर दी गई थी। स्थानीय लोग उसे ‘बीहड़ वाले सैयद बाबा’ के नाम से पुकारते थे। समय के साथ वहां पक्की सीढ़ियों और अन्य संरचनाओं का निर्माण कर लिया गया था।
ध्वस्तीकरण की मांग पर लगी मुहर
इस पूरे विवाद की शुरुआत 23 जनवरी को हुई थी, जब वन रेंजर अशोक कुमार शर्मा ने वाद दायर किया था। उन्होंने आरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण का हवाला देते हुए मजार के ध्वस्तीकरण की मांग की थी। मजार प्रबंधन को नोटिस जारी कर कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई थी। अब न्यायालय के ताजा आदेश के बाद वन विभाग बेदखली की तैयारी कर रहा है। फिलहाल विभाग ने इस संरचना को हटाने के लिए कोई विशेष तारीख तय नहीं की है।
