RSS प्रमुख मोहन भागवत की Z+ सुरक्षा पर उठे सवाल, बॉम्बे हाईकोर्ट ने PIL खारिज कर याचिकाकर्ता को लगाई फटकार

Maharashtra News: बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत को दी गई ‘Z प्लस’ सुरक्षा को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने इस याचिका को न केवल ‘आधारहीन’ बताया, बल्कि इसे किसी खास उद्देश्य से प्रेरित (Motivated) करार दिया। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि याचिका में जनहित का कोई भी वास्तविक मुद्दा शामिल नहीं है।

याचिकाकर्ता का दावा: ‘गैर-पंजीकृत’ संगठन को सुरक्षा क्यों?

ललन किशोर सिंह नामक व्यक्ति ने वकील अश्विन इंगोले के माध्यम से यह PIL दाखिल की थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि RSS एक ‘गैर-पंजीकृत’ संगठन है। सिंह का तर्क था कि केंद्र सरकार करदाताओं के पैसे का उपयोग करके किसी ऐसे संगठन के प्रमुख को इतनी महंगी सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती। याचिका में मांग की गई थी कि मोहन भागवत की सुरक्षा पर अब तक खर्च किया गया सार्वजनिक धन RSS से वापस वसूला जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा- बिना रिसर्च के दाखिल की गई याचिका

महाराष्ट्र के सरकारी वकील देवेंद्र चौहान ने कोर्ट के फैसले की पुष्टि करते हुए बताया कि पीठ याचिकाकर्ता के तर्कों से सहमत नहीं थी। चीफ जस्टिस ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि PIL दाखिल करने से पहले कोई उचित रिसर्च या शोध नहीं किया गया। अदालत ने पाया कि यह याचिका करदाताओं के हितों की रक्षा के बजाय किसी निजी या राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित अधिक लग रही थी। इसी वजह से खंडपीठ ने इसे सुनवाई के योग्य नहीं माना।

सरकारी वकील ने तथ्यों को छिपाने का लगाया आरोप

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील देवेंद्र चौहान ने याचिकाकर्ता की नीयत पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि ललन किशोर सिंह ने इसी मुद्दे पर राज्य सूचना आयुक्त द्वारा उनके खिलाफ पहले पारित किए गए एक आदेश की जानकारी जानबूझकर छिपाई थी। चौहान ने तर्क दिया कि कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के इरादे से यह याचिका दायर की गई थी। इन दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने याचिका को खारिज करने का आदेश दिया।

क्या है Z प्लस सुरक्षा का कानूनी आधार?

आमतौर पर भारत में सुरक्षा श्रेणियां किसी व्यक्ति को मिलने वाली ‘खतरे की आशंका’ (Threat Perception) के आधार पर तय की जाती हैं, न कि उनके संगठन के पंजीकरण की स्थिति पर। खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर गृह मंत्रालय सुरक्षा कवच प्रदान करता है। मोहन भागवत को देश के सबसे सुरक्षित वीआईपी में गिना जाता है। अदालत ने इस मामले में दखल देने से इनकार कर यह साफ कर दिया है कि सुरक्षा संबंधी निर्णय लेना कार्यपालिका का विशेषाधिकार है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
/ month
placeholder text

Hot this week

Topics

Related Articles

Popular Categories