यंगस्टर्स में बढ़ रहा OCD का खतरा, बार-बार हाथ धोना और लॉक चेक करना हो सकता है लक्षण

Health News: बदलती लाइफस्टाइल के कारण युवाओं में ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इसका सीधा असर उनकी दिनचर्या और काम पर पड़ रहा है। बिना किसी वजह काम को बार-बार करना इस बीमारी का बड़ा लक्षण है। इंडियन साइकियाट्री सोसाइटी यूपी के सेमिनार में विशेषज्ञों ने बताया कि ट्रांसक्रैनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन (टीडीसीएस) तकनीक इस समस्या के इलाज में बेहद कारगर साबित हो रही है।

यंगस्टर्स में ओसीडी के ये हैं मुख्य लक्षण

युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन ओसीडी के मामले भी बढ़ रहे हैं। थोड़ी सी समस्या आने पर युवा बार-बार वही काम दोहराते हैं। इनमें बार-बार हाथ धोना, लॉक को चेक करना और नहाने में ज्यादा समय लगाना शामिल है। इस वजह से उनका फ्रस्ट्रेशन बढ़ता है और वह टेंशन का शिकार हो जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बिना वजह ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत साइकियाट्रिस्ट से सलाह लेनी चाहिए। साधारण उदासी को डिप्रेशन समझने की गलती न करें। डॉ. सुजीत कर ने यह जानकारी दी।

डिप्रेशन और माइग्रेन में कारगर है tDCS तकनीक

साइकियाट्री और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के इलाज के लिए एडवांस्ड टीडीसीएस तकनीक काफी प्रभावी साबित हो रही है। इस तकनीक में मरीज के दिमाग के पास हल्का इलेक्ट्रिक करंट दिया जाता है। इससे न तो झटका लगता है और न ही बेहोशी आती है। यह तकनीक डिप्रेशन, सिजोफ्रेनिया, ओसीडी, माइग्रेन और स्ट्रोक जैसी समस्याओं के इलाज में इस्तेमाल की जा रही है। डॉ. आदर्श त्रिपाठी के अनुसार, यह उपचार हर मरीज को नहीं देना चाहिए। बीमारी की गंभीरता, दवा के असर और मरीज की स्थिति देखने के बाद ही यह तकनीक अपनाई जाती है।

युवाओं में मानसिक बीमारी क्यों बढ़ रही है?

विशेषज्ञों का कहना है कि युवा उम्र में मानसिक बीमारी लगातार बढ़ रही है। इसके पीछे तनावपूर्ण जीवनशैली, आर्थिक स्थिति, बढ़ता खर्च, पारिवारिक गतिशीलता और सांस्कृतिक बदलाव जैसे कारण हैं। आजकल बचपन में भी डिप्रेशन के मामले बढ़ रहे हैं। इसकी बड़ी वजह सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल, पढ़ाई का दबाव, परिवार का दबाव और पेरेंटिंग के तरीकों में बदलाव हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ अधिक समय बिताएं। उन पर पढ़ाई का दबाव न बनाएं और उन्हें अपनी हॉबी फॉलो करने दें। इससे मानसिक बीमारी का खतरा कम हो सकता है।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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