Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले में ग्राम प्रधानों का पांच साल का कार्यकाल अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है। आगामी 26 मई को मौजूदा प्रधानों का कार्यकाल आधिकारिक रूप से समाप्त होने जा रहा है। हालांकि, पंचायत चुनावों की तिथियों में संभावित देरी ने स्थानीय राजनीति में भारी असमंजस पैदा कर दिया है। जिले की 882 ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों की रफ्तार सुस्त पड़ गई है और प्रधानों में इस बात को लेकर गहरी चिंता है कि क्या उन्हें आगे भी जिम्मेदारी मिलेगी या गांवों की कमान प्रशासकों के हाथों में सौंप दी जाएगी।
प्रशासकों की नियुक्ति की आहट से महराजगंज में हड़कंप
महराजगंज की चार तहसीलों—महराजगंज, फरेंदा, निचलौल और नौतनवा—के तहत आने वाले 12 ब्लॉकों में इस समय एकमात्र चर्चा पंचायत चुनाव और प्रशासकों की नियुक्ति को लेकर है। अकेले परतावल ब्लॉक की 104 पंचायतों में माहौल बेहद तनावपूर्ण है। नियमानुसार, यदि 26 मई तक चुनाव प्रक्रिया संपन्न नहीं होती है, तो शासन द्वारा विकास कार्यों के संचालन के लिए प्रशासक नियुक्त किए जा सकते हैं। इस प्रशासनिक बदलाव की आशंका ने मौजूदा प्रधानों की नींद उड़ा दी है, क्योंकि इससे गांव के विकास कार्यों और बजट पर उनकी पकड़ पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
चुनाव टलने के विरोध में प्रधानों ने खोला मोर्चा
पंचायत चुनाव समय पर न होने की संभावना से भड़के ग्राम प्रधानों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। परतावल ब्लॉक सभागार में आयोजित एक अहम बैठक में प्रधानों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए आंदोलन की रणनीति तैयार की है। प्रधान संगठन के जिलाध्यक्ष एजाज अहमद और उपाध्यक्ष सचिन सिंह ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार ने ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में कार्य करने का अवसर नहीं दिया या चुनाव में अत्यधिक देरी की, तो वे न्यायालय की शरण लेंगे। प्रधानों का तर्क है कि कार्यकाल न बढ़ने से मनरेगा और अन्य विकास योजनाएं पूरी तरह ठप हो जाएंगी।
रुके हुए विकास कार्य और ग्रामीणों की बढ़ती नाराजगी
कार्यकाल समाप्ति के करीब आते ही गांवों में जमीनी स्तर पर समस्याएं गहराने लगी हैं। मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों का भुगतान लंबित होने से उनमें भारी रोष है। कई पंचायतों में सामग्री की आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों ने भी बकाया भुगतान न होने के डर से काम बीच में ही रोक दिया है। हालात यह हैं कि गांवों की नालियों की सफाई से लेकर सीसी रोड के निर्माण तक के कार्य अधर में लटके हैं। प्रधानों का कहना है कि बजट की अनिश्चितता और चुनाव की आहट के कारण कोई भी नई योजना शुरू करना अब नामुमकिन सा हो गया है।
गांव की गलियों में सक्रिय हुए नए और युवा चेहरे
एक तरफ जहां मौजूदा प्रधान अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, वहीं गांवों में नए राजनीतिक समीकरण बनने शुरू हो गए हैं। संभावित प्रत्याशी और युवा चेहरे अब चौपालों पर सक्रिय नजर आ रहे हैं। 15 अप्रैल को मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन के बाद से ही चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। लोग अब विकास के नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, जिससे मौजूदा प्रधानों के लिए अपनी साख बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। शासन के अगले दिशा-निर्देशों पर ही अब महराजगंज की ग्रामीण राजनीति का अगला अध्याय निर्भर करेगा।
