मदरसे की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: अधिग्रहण के 25 साल बाद दखल से इनकार, बार-बार केस दर्ज करने पर जताई नाराजगी

Prayagraj News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुरादाबाद के मंगूपुरा गांव में भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली मदरसा जामिया अरबिया हयातुल उलूम की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अधिग्रहण की प्रक्रिया दशकों पहले पूरी हो चुकी है। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जब जमीन का कब्जा लेकर वह राज्य सरकार में निहित हो जाती है, तो उसे किसी भी सूरत में अधिग्रहण से मुक्त नहीं किया जा सकता।

न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया

अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा एक ही मुद्दे पर बार-बार याचिकाएं दायर करने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग करार दिया। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि मदरसे ने इस अधिग्रहण को रोकने के लिए पहले भी चार बार अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं। हर बार याचिकाओं का निस्तारण या खारिज होना, इसके बावजूद दोबारा कोर्ट का दरवाजा खटखटाना अदालत को नागवार गुजरा।

‘नया मुरादाबाद’ योजना की जमीन का मामला

विवाद की जड़ मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (MDA) की ‘नया मुरादाबाद’ आवासीय और व्यावसायिक योजना है। प्राधिकरण ने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए कुल 175.44 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया था। मदरसे का तर्क था कि उनकी भूमि पर 1979-80 से शैक्षणिक गतिविधियां चल रही हैं। उन्होंने नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 की धारा 24(2) का सहारा लेते हुए दावा किया था कि उन्हें न तो मुआवजा मिला और न ही जमीन का भौतिक कब्जा लिया गया।

मुआवजा जमा, कॉलोनी भी हो चुकी है विकसित

मुरादाबाद विकास प्राधिकरण ने कोर्ट में इन दावों को मजबूती से चुनौती दी। प्राधिकरण की ओर से दलील दी गई कि भूमि का कब्जा 7 नवंबर 2000 को ही लिया जा चुका था। इसके अलावा, मुआवजे की निर्धारित राशि भी सरकारी खजाने में बहुत पहले ही जमा कराई जा चुकी है। प्राधिकरण ने कोर्ट को यह भी बताया कि विवादित भूमि पर पहले ही एक पूरी आवासीय कॉलोनी विकसित हो चुकी है और कई लोगों को वहां भूखंड भी आवंटित किए जा चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का दिया हवाला

अपने फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहर लाल’ मामले का जिक्र किया। अदालत ने कहा कि 2013 के नए अधिनियम की धारा 24(2) का उपयोग उन मामलों को फिर से जीवित (Revive) करने के लिए नहीं किया जा सकता, जो कानूनी रूप से बहुत पहले ही समाप्त हो चुके हैं। इस फैसले के बाद अब ‘नया मुरादाबाद’ योजना में आवंटित भूखंडों और विकास कार्यों पर मंडरा रहे कानूनी संकट के बादल छंट गए हैं।

अधिग्रहण मुक्त नहीं हो सकती सरकारी जमीन

हाई कोर्ट के इस निर्णय ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े कानूनों को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। खंडपीठ ने कहा कि लंबी अवधि बीत जाने के बाद न्यायिक हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। एक बार जब राज्य सरकार जमीन का विधिवत कब्जा ले लेती है, तो वह संपत्ति सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित हो जाती है। मदरसे की दलीलों को खारिज करते हुए अदालत ने साफ किया कि शैक्षणिक संस्थान का हवाला देकर कानूनी प्रक्रियाओं और पुराने समझौतों को बदला नहीं जा सकता।

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