India News: सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल ने केंद्र सरकार के नए श्रम कानूनों की जमकर सराहना की है। उन्होंने 4 नई श्रम संहिताओं (Labour Codes) को भारतीय इतिहास में एक ‘युगांतरकारी बदलाव’ करार दिया। जस्टिस करोल ने कहा कि ये सुधार बिखरी हुई श्रम प्रणाली को एक सुसंगत और समावेशी ढांचे में बदल देंगे। उनके अनुसार, इन संहिताओं का मुख्य उद्देश्य देश के आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय को एक साथ जोड़ना है।
फिल्मों के जरिए समझा श्रमिक वर्ग का संघर्ष
अंबेडकर जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम में जस्टिस करोल ने सिनेमा और समाज के रिश्तों पर दिलचस्प चर्चा की। उन्होंने युवा वकीलों को ‘दो बीघा जमीन’, ‘नया दौर’, ‘दीवार’ और ‘काला पत्थर’ जैसी फिल्में देखने की नसीहत दी। जस्टिस करोल के मुताबिक, इन फिल्मों ने दशकों तक मजदूरों की त्रासदी और उनके संघर्ष को आवाज दी है। उन्होंने दुख जताया कि आज का सिनेमा श्रमिक वर्ग की कहानियों को छोड़कर केवल पूंजीवादी कहानियों की ओर बढ़ गया है।
29 केंद्रीय कानूनों की जगह आई 4 नई संहिताएं
भारत सरकार ने 21 नवंबर, 2025 से देश भर में चार नई श्रम संहिताएं पूरी तरह लागू कर दी हैं। इन नई संहिताओं में कुल 29 पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित किया गया है। जस्टिस करोल ने बताया कि इनका उद्देश्य कंपनियों के लिए नियमों का पालन सरल बनाना है। साथ ही, ये कानून मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा और उनकी कामकाजी परिस्थितियों में बड़ा सुधार लाएंगे। उन्होंने इसे संवैधानिक आदर्शों और आर्थिक वास्तविकताओं का एक अनूठा संगम बताया।
वकीलों से मजदूरों के अधिकारों की रक्षा का आह्वान
न्यायमूर्ति करोल ने विशेष रूप से युवा वकीलों से अपील की कि वे समाज के कमजोर तबके के लिए खड़े हों। उन्होंने कहा कि नए कानूनों को जमीन पर उतारने में कानूनी बिरादरी की भूमिका सबसे अहम है। वकीलों को मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ आगे आना चाहिए। जस्टिस करोल के अनुसार, इन कानूनों की असली सफलता केवल कागजों पर नहीं, बल्कि इनकी जवाबदेही और निरंतर सुधार की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
बाबासाहेब अंबेडकर के योगदान को किया याद
डॉ. बी.आर. अंबेडकर को याद करते हुए जस्टिस करोल ने उनकी दूरदर्शिता की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब जमीनी हकीकत को बखूबी समझते थे। उनके पास लोगों की बुनियादी समस्याओं को ठोस कानूनी विचारों में बदलने की अद्भुत क्षमता थी। जस्टिस करोल ने वकीलों को प्रेरित किया कि वे अंबेडकर के मार्ग पर चलते हुए न्याय सुनिश्चित करें। उन्होंने जोड़ा कि सामूहिक प्रतिबद्धता से ही हम एक बेहतर और न्यायपूर्ण कार्य संस्कृति का निर्माण कर पाएंगे।
