Punjab and Haryana News: पंजाब सरकार के हालिया ‘जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) कानून, 2026’ को दी गई कानूनी चुनौती ने नया मोड़ ले लिया है। बुधवार को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मामला कानून की वैधता से हटकर याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता पर केंद्रित हो गया। कोर्ट ने कड़े संकेत दिए कि किसी भी बड़े संवैधानिक सवाल पर विचार करने से पहले यह जांचना जरूरी है कि क्या याचिकाकर्ता “साफ हाथों” के साथ अदालत आया है।
क्या है नया कानून और क्यों है विरोध?
पंजाब सरकार ने हाल ही में 2008 के मूल अधिनियम में संशोधन कर बेअदबी से जुड़े अपराधों के लिए बेहद सख्त सजा का प्रावधान किया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) में धार्मिक भावनाओं को आहत करने के खिलाफ पहले से ही पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। याचिका में कहा गया है कि नए कानून में सजा को बहुत ज्यादा कठोर बना दिया गया है, जो केंद्रीय कानूनों के साथ मेल नहीं खाता। इस विरोधाभास के कारण कानून की वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना कानून पर सवाल
याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत में दलील दी कि आपराधिक कानून संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) का हिस्सा है। ऐसे में यदि राज्य का कानून केंद्रीय कानून (BNS) के खिलाफ है, तो अनुच्छेद 254 के तहत राष्ट्रपति की अनिवार्य स्वीकृति आवश्यक है। याचिका में दावा किया गया है कि चूंकि इस कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली है, इसलिए इसे शून्य घोषित किया जाना चाहिए। बिना उच्च अनुमति के इतने गंभीर दंड वाले कानून को लागू करना असंवैधानिक बताया जा रहा है।
20 साल की कैद और उम्रकैद का प्रावधान
संशोधित कानून की धाराओं के तहत बेअदबी के मामलों में सजा का दायरा काफी बढ़ा दिया गया है। इसमें बेअदबी के लिए न्यूनतम 7 वर्ष से लेकर 20 वर्ष तक की कैद और साजिश रचने के मामलों में आजीवन कारावास (उम्रकैद) तक का प्रावधान है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून में ‘आपराधिक मंशा’ (Mens Rea) को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। इससे सामान्य परिस्थितियों में भी लोगों को गंभीर और कठोर दंड मिलने का खतरा पैदा हो सकता है।
सरकार ने उठाए याचिकाकर्ता की ‘साख’ पर सवाल
पंजाब सरकार ने इस मामले में याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि को लेकर कोर्ट में बड़ा खुलासा किया है। सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ दर्ज पूर्व एफआईआर, बार काउंसिल विवाद और लाइसेंस निलंबन जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है। सरकार ने उसे ‘आदतन शिकायतकर्ता’ (Habitual Complainant) करार देते हुए कहा कि यह याचिका केवल न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। सरकार का तर्क है कि तथ्य छिपाने वाले व्यक्ति की जनहित याचिका सुनवाई योग्य नहीं होनी चाहिए।
अगली सुनवाई ‘मेंटेनेबिलिटी’ के सवाल पर
हाईकोर्ट की पीठ ने फिलहाल कानून की वैधता पर चर्चा रोक दी है। अदालत अब सबसे पहले यह तय करेगी कि क्या यह याचिका सुनने लायक है या नहीं। कोर्ट ने पंजाब सरकार द्वारा पेश किए गए रिकॉर्ड की कॉपी याचिकाकर्ता को देने के निर्देश दिए हैं। अब अगले सप्ताह होने वाली सुनवाई पूरी तरह से याचिका की ‘मेंटेनेबिलिटी’ (सुनवाई योग्यता) पर आधारित होगी। इस कानूनी दांवपेच के चलते फिलहाल सख्त बेअदबी कानून पर फैसला टल गया है।


