RTE में ‘हकदारों’ के हक पर प्रभावशाली लोगों का डाका: ग्राम प्रधान ने खुद को दिखाया गरीब, फर्जी पते का भी खुला खेल

Education News: आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए शुरू की गई ‘राइट टू एजुकेशन’ (RTE) योजना विवादों के घेरे में है। ताजा मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पात्र बच्चों के हक को छीनने के लिए प्रभावशाली लोग नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में एक ग्राम प्रधान द्वारा अपने बच्चे का दाखिला आरटीई कोटे में कराने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस घटना ने शिक्षा विभाग की सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

70 हजार दिखाई आय, दस्तावेजों पर उठे सवाल

प्रवेश प्रक्रिया के दौरान सामने आया कि एक ग्राम प्रधान ने अपने बच्चे के दाखिले के लिए प्रस्तुत आय प्रमाण पत्र में अपनी वार्षिक आय मात्र 70 हजार रुपये दर्शाई है। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि प्रधान की वास्तविक आर्थिक स्थिति इस आंकड़े से कहीं अधिक बेहतर है। दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच में यह मामला संदिग्ध पाया गया है। हालांकि औपचारिक जांच अभी प्रक्रियाधीन है, लेकिन इस प्रकरण ने यह साफ कर दिया है कि रसूखदार लोग किस तरह ‘गरीब’ बनकर सरकारी योजनाओं का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं।

फर्जी पते और रेंट एग्रीमेंट का सहारा

धांधली का एक और मामला निवास स्थान के फर्जीवाड़े से जुड़ा है। एक अभिभावक, जो मूल रूप से प्रीत विहार के पॉश इलाके में रहते हैं, उन्होंने स्कूल के नजदीक का फर्जी किरायानामा (Rent Agreement) लगाकर आवेदन किया है। पोल तब खुली जब यह पता चला कि उसी परिवार के अन्य बच्चे रोजाना प्रीत विहार से ही स्कूल आते-जाते हैं। आरटीई के तहत स्कूल से दूरी के आधार पर प्राथमिकता दी जाती है, और इसी नियम का फायदा उठाने के लिए फर्जी पते का खेल धड़ल्ले से चल रहा है।

शिक्षा विभाग की सख्त चेतावनी

इन गड़बड़ियों पर कड़ा रुख अपनाते हुए खंड शिक्षा अधिकारी सावेद आलम ने कहा है कि यदि जांच में आरोप सही पाए गए, तो न केवल आवेदन निरस्त किए जाएंगे, बल्कि धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी। उन्होंने माना कि यह मामला गंभीर है और शिक्षा विभाग इसे हल्के में नहीं लेगा। विभाग अब उन सभी आवेदनों की दोबारा स्क्रूटनी करने पर विचार कर रहा है जो संदेह के दायरे में हैं, ताकि वास्तविक जरूरतमंद बच्चों का हक सुरक्षित रहे।

सत्यापन प्रणाली में बदलाव की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि आरटीई में धांधली रोकने के लिए ‘आय सत्यापन प्रणाली’ को आयकर विभाग के डिजिटल डेटाबेस से जोड़ना अनिवार्य है। वर्तमान में स्थानीय स्तर पर जारी प्रमाण पत्रों पर निर्भरता ही भ्रष्टाचार की मुख्य वजह है। इसके अलावा, निवास सत्यापन के लिए आधार आधारित एड्रेस वेरिफिकेशन या जियो-टैगिंग जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग समय की मांग है। जब तक सिस्टम पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी नहीं होगा, तब तक प्रभावशाली लोग गरीबों के कोटे में सेंधमारी करते रहेंगे।

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