New Delhi News: देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए आठवें वेतन आयोग से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। नई दिल्ली में हाल ही में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक में कर्मचारी संगठनों ने सरकार के समक्ष वेतन वृद्धि का एक ऐतिहासिक प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के अनुसार, कर्मचारियों का न्यूनतम मूल वेतन मौजूदा 18,000 रुपये से बढ़ाकर सीधे 69,000 रुपये करने की मांग की गई है। 28 से 30 अप्रैल 2026 के बीच हुई इस औपचारिक चर्चा ने कर्मचारियों में भारी उत्साह पैदा कर दिया है।
फिटमेंट फैक्टर में भारी बढ़ोतरी की मांग
कर्मचारी संगठनों ने सरकार के सामने फिटमेंट फैक्टर को 3.83 करने की महत्वपूर्ण मांग रखी है। वर्तमान में सातवें वेतन आयोग के तहत कर्मचारियों को 2.57 फिटमेंट फैक्टर का लाभ मिल रहा है। यदि सरकार 126 बेसिस पॉइंट की इस बढ़ोतरी को मंजूरी दे देती है, तो वेतन और पेंशन में लगभग 283 प्रतिशत तक का जबरदस्त इजाफा होगा। यह फिटमेंट फैक्टर वह गुणांक है, जो पुरानी बेसिक सैलरी को नए वेतन ढांचे में बदलने का आधार बनता है।
₹18,000 से ₹69,000 तक ऐसे पहुंचेगी सैलरी
वेतन गणना के नए गणित के अनुसार, यदि न्यूनतम बेसिक सैलरी 18,000 रुपये है और फिटमेंट फैक्टर 3.83 लागू होता है, तो नई प्रस्तावित सैलरी 68,940 रुपये हो जाएगी। यह बढ़ोतरी केवल निचले स्तर के कर्मियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि मिड-लेवल और वरिष्ठ अधिकारियों के वेतन में भी इसी अनुपात में बड़ी वृद्धि होगी। पेंशनभोगियों के लिए भी यह राहत की खबर है क्योंकि 9,000 रुपये की न्यूनतम पेंशन बढ़कर 34,470 रुपये मासिक हो सकती है।
पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली का उठा मुद्दा
इस महत्वपूर्ण बैठक में केवल वेतन वृद्धि पर ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि नेशनल काउंसिल (NC-JCM) ने पुरानी पेंशन योजना की बहाली की मांग भी दोहराई। कर्मचारी संगठनों का स्पष्ट मानना है कि बाजार जोखिम वाली योजनाओं के बजाय उन्हें एक सुनिश्चित सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता है। संगठनों ने सरकार को बताया कि 2016 के बाद से जीवन स्तर और महंगाई में जो बदलाव आए हैं, उन्हें देखते हुए वर्तमान वेतन ढांचा पूरी तरह से अपर्याप्त साबित हो रहा है।
आधुनिक जरूरतों के आधार पर वेतन पुनर्गठन का तर्क
यूनियनों ने इस भारी बढ़ोतरी के पीछे आधुनिक जीवनशैली और बढ़ते खर्चों का ठोस तर्क दिया है। संगठनों का कहना है कि अब इंटरनेट, डिजिटल सेवाएं, स्वास्थ्य और बच्चों की उच्च शिक्षा विलासिता नहीं बल्कि अनिवार्य जरूरतें बन चुकी हैं। निजी अस्पतालों के खर्च और शहरों में बढ़ते मकान किराए ने मध्यम वर्गीय कर्मचारियों की कमर तोड़ दी है। कर्मचारी पक्ष का मानना है कि वेतन निर्धारण का पुराना फॉर्मूला अब वर्तमान उपभोग पैटर्न के साथ मेल नहीं खाता है।


