Himachal News: मंडी नगर निगम के वार्ड नंबर एक खलियार में चुनावी बिसात बिछते ही कांग्रेस के भीतर वर्चस्व की जंग छिड़ गई है। यह मुकाबला अब महज एक पार्षद की सीट का नहीं, बल्कि साख का सवाल बन चुका है। टिकट के लिए मचे इस संग्राम ने शिमला से दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। पार्टी हाईकमान के सामने अब दिग्गज नेता कौल सिंह ठाकुर और मजबूत जनाधार वाली अलकनंदा हांडा के बीच किसी एक को चुनने की बड़ी चुनौती खड़ी है।
भतीजे की जीत के लिए कौल सिंह ने झोंकी पूरी ताकत
पूर्व मंत्री कौल सिंह ठाकुर अपने भतीजे और अधिवक्ता प्रवीण ठाकुर को इस बार चुनावी मैदान में उतारने पर अड़ गए हैं। प्रवीण ठाकुर ने अधिकारिक तौर पर दावेदारी पेश की है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कौल सिंह अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में भतीजे को टिकट नहीं दिला पाते, तो यह उनके राजनीतिक वर्चस्व के लिए एक बड़ा झटका माना जाएगा। उनकी बहन और जिला अध्यक्ष चंपा ठाकुर भी इस पैरवी में सक्रिय रूप से जुटी हैं।
अलकनंदा हांडा का दबदबा और खत्री वोट बैंक का गणित
दूसरी तरफ, वरिष्ठ अधिवक्ता अलकनंदा हांडा की इस वार्ड पर ऐतिहासिक पकड़ है। वह खलियार वार्ड से लगातार चार बार चुनाव जीत चुकी हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत खत्री समुदाय के मतदाता हैं, जो यहाँ जीत-हार तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भाजपा ने इस वर्ग को साधने के लिए पहले ही दो महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर मास्टरस्ट्रोक खेल दिया है। ऐसे में कांग्रेस के लिए अलकनंदा को नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता है।
बगावत की चेतावनी से कांग्रेस हाईकमान की बढ़ी चिंता
अलकनंदा हांडा ने कड़ा रुख अपनाते हुए बगावत के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि वह चुनावी मैदान से पीछे नहीं हटेंगी। यदि पार्टी कौल सिंह के दबाव में आकर उनका टिकट काटती है, तो वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ सकती हैं। इस धमकी ने कांग्रेस के भीतर की पुरानी गुटबाजी को सार्वजनिक कर दिया है। इससे चुनाव से पहले पार्टी की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
दिल्ली के फैसले पर टिकी हैं सबकी निगाहें
खलियार वार्ड की इस खींचतान ने कांग्रेस हाईकमान को धर्मसंकट में डाल दिया है। एक तरफ पार्टी के पुराने स्तंभ कौल सिंह ठाकुर की प्रतिष्ठा है, तो दूसरी तरफ अलकनंदा हांडा का मजबूत स्थानीय जनाधार। यदि पार्टी खत्री समुदाय को प्रतिनिधित्व नहीं देती, तो उसे भारी चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली दरबार कौल सिंह का रसूख बचाता है या अलकनंदा के भरोसे चुनावी नैया पार लगाता है।


