सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘बिना सुनवाई के जेल में सड़ाना सबसे बड़ी सजा’, न्याय के नाम पर यह कैसा मजाक?

New Delhi News: देश की सबसे बड़ी अदालत ने न्याय प्रणाली की सुस्ती पर एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि मुकदमे की सुनवाई शुरू किए बिना ही किसी आरोपी को सालों तक जेल में बंद रखना उसे सीधे सजा देने के बराबर है। पंजाब के एक मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ कर दिया कि आपराधिक कार्यवाही में बेवजह की देरी किसी भी इंसान की लंबी कैद को सही नहीं ठहरा सकती। यह फैसला उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर आया है, जो बिना अपना जुर्म साबित हुए जेल की काल कोठरियों में न्याय का इंतजार कर रहे हैं।

क्या है पूरा मामला और अदालत ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ पंजाब के एक मामले की सुनवाई कर रही थी। मामला जबरन वसूली और हत्या के प्रयास का था। आरोपी प्रदीप कुमार उर्फ बानू को अप्रैल 2024 में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी को लगभग दो साल बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक निचली अदालत में मुकदमा शुरू ही नहीं हुआ है। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया था। इसके बाद आरोपी ने इंसाफ के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को तुरंत रद्द कर दिया।

23 गवाहों की लिस्ट, लेकिन पूछताछ एक से भी नहीं

इस पूरे मामले में जांच एजेंसियों की भारी लापरवाही खुलकर सामने आई है। पुलिस और अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि इस मामले में कुल 23 गवाहों से पूछताछ होनी है। हैरानी की बात यह है कि पिछले दो सालों में एक भी गवाह से पूछताछ नहीं की गई। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि जिस गति से काम हो रहा है, उससे मुकदमे के जल्द पूरा होने की कोई उम्मीद नहीं है। पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक मुकदमा खत्म नहीं होता, तब तक आरोपी को बेवजह हिरासत में रखना पूरी तरह अनुचित है। अदालत ने आरोपी को कड़ी शर्तों के साथ जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

संविधान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हो रहा मजाक

सुप्रीम कोर्ट पिछले कुछ समय से लगातार जांच एजेंसियों और निचली अदालतों को फटकार लगा रहा है। हाल ही में एक अन्य मामले में अदालत ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को भी आड़े हाथों लिया था। वहां एक विचाराधीन कैदी को सात साल तक जेल में रखा गया और सिर्फ सात गवाहों से पूछताछ हुई। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 और इंसान की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ‘मजाक’ करार दिया था। अदालत का मानना है कि गलत तरीके से जेल में रहना इंसान और उसके परिवार पर जीवन भर के लिए गहरे घाव छोड़ जाता है। भले ही बाद में वह व्यक्ति बेकसूर साबित होकर बरी क्यों न हो जाए।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
/ month
placeholder text

Hot this week

Topics

Related Articles

Popular Categories