India News: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल मतदाता सूची विवाद पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि मतदाता दो बड़ी संवैधानिक संस्थाओं के बीच बुरी तरह पिस रहा है। चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान संदिग्ध मतदाताओं की सूची तैयार की थी। अदालत ने इस प्रक्रिया में तार्किक विसंगति पाई है।
संस्थाओं की आपसी लड़ाई में पिस रही जनता
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह सरकार और चुनाव आयोग की लड़ाई नहीं है। इसे दोष मढ़ने का खेल नहीं माना जा सकता। असली मुद्दा निर्दोष मतदाताओं का है। आम वोटर दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच फंस गए हैं। चुनाव आयोग ने दलील दी कि न्यायिक अधिकारियों ने सैंतालीस प्रतिशत मामले खारिज किए हैं। इस पर अदालत ने कहा कि सही साधन ही परिणामों को उचित ठहराते हैं।
अदालत का काम चुनाव प्रक्रिया में मदद करना है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों का मुख्य काम चुनावों को बढ़ावा देना है। न्यायालय चुनाव प्रक्रिया में कोई रुकावट नहीं डालना चाहता है। जस्टिस बागची ने बताया कि चुनाव नतीजों में आसानी से दखल नहीं दिया जा सकता है। ऐसा भारी संख्या में वोटरों को बाहर करने पर ही संभव है। यदि दस प्रतिशत मतदाता वोट नहीं डालते और जीत का अंतर अधिक है, तो कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन जीत का अंतर पांच प्रतिशत से कम होने पर अदालत को गहराई से विचार करना पड़ता है।
उम्मीदवारों और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने के अधिकार को अहम बताया है। जस्टिस बागची ने कहा कि पहले ट्रिब्यूनल के सामने उम्मीदवार को तरजीह मिलती थी। इसका कारण चुनाव लड़ने के अधिकार को सुरक्षित रखना है। किसी नागरिक को इससे वंचित नहीं किया जा सकता है। अदालत ने चुनाव आयोग को अपना रुख साफ कर दिया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह बाहर किए गए मतदाताओं के भविष्य को लेकर भी पूरी तरह से चिंतित है।
