New Delhi News: राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद के. लक्ष्मण ने ओबीसी आरक्षण को लेकर एक बड़ा मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि धर्म के नाम पर इस आरक्षण का दुरुपयोग हो रहा है। उनका कहना था कि कुछ राज्य सरकारें मुसलमानों को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण दे रही हैं। उनकी इस मांग के बाद विपक्षी सदस्य सदन से वॉकआउट कर गए। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या संविधान में मुसलमानों को आरक्षण देने का प्रावधान है? आइए समझते हैं कि इस मामले पर संविधान और सुप्रीम कोर्ट की क्या राय है।
संविधान क्या कहता है? क्या धर्म के आधार पर आरक्षण संभव?
भारत केसंविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण की स्पष्ट मनाही है। अनुच्छेद 15(1) और 16(2) राज्य को निर्देश देते हैं कि वह किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। यानी सिर्फ मुसलमान होने के कारण किसी को आरक्षण देना असंवैधानिक है।
हालांकि, संविधान में दो महत्वपूर्ण अपवाद भी हैं। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को यह अधिकार देते हैं कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है। इसी के तहत आरक्षण दिया जाता है। इसका साफ मतलब है कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन होना चाहिए।
इंदिरा साहनी केस: सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला जिसने तय किए मापदंड
ओबीसीआरक्षण पर सबसे अहम फैसला सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ केस में दिया था। इसे मंडल कमीशन केस के नाम से भी जाना जाता है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिछड़े वर्ग की परिभाषा सिर्फ हिंदू समाज की जातियों तक सीमित नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि मुसलमान, ईसाई और सिख जैसे समुदायों में भी सदियों से ऐसे कई समूह मौजूद हैं जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर मुसलमानों के भीतर कोई समूह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है, तो उसे ओबीसी सूची में शामिल किया जा सकता है। यह आरक्षण उन्हें उनके पिछड़ेपन के कारण मिलेगा, न कि धर्म के कारण।
मंडल कमीशन और पसमांदा मुसलमानों की पहचान
1980 मेंबीपी मंडल की अध्यक्षता वाले पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपनी रिपोर्ट में हिंदू समाज की तरह ही मुस्लिम समाज की जातियों और बिरादरियों का विस्तृत अध्ययन किया था। मंडल कमीशन ने अपनी सूची में 80 से अधिक मुस्लिम समूहों को ओबीसी के रूप में चिन्हित किया था।
इनमें वे समूह शामिल थे जो पारंपरिक रूप से निचले माने जाने वाले व्यवसायों से जुड़े थे। इन्हें पसमांदा या पिछड़े मुसलमान कहा जाता है। जैसे अंसारी (बुनकर), कुरैशी (कसाई), मंसूरी (धुनिया) और सलमानी (नाई) आदि। आज केंद्र और कई राज्यों की ओबीसी सूची में ये समूह शामिल हैं। उन्हें मिलने वाला आरक्षण इस्लाम धर्म के कारण नहीं, बल्कि उनके ऐतिहासिक पिछड़ेपन के कारण है।
आंध्र प्रदेश का उदाहरण: कैसे मिला मुसलमानों को आरक्षण
जब भीधर्म के आधार पर आरक्षण का मामला उठता है, आंध्र प्रदेश का उदाहरण सबसे ऊपर आता है। 2004 में तत्कालीन राज्य सरकार ने सभी मुसलमानों को 5% आरक्षण देने का आदेश दिया था। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इसे धर्म के आधार पर बताते हुए तुरंत रद्द कर दिया।
इसके बाद राज्य सरकार ने एक पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया। आयोग ने मुसलमानों के भीतर विशिष्ट पिछड़े समूहों की पहचान की। 2007 में सरकार ने नया कानून बनाकर सिर्फ इन चुनिंदा पिछड़े समूहों को 4% आरक्षण दिया। इसे ‘ई’ कैटेगरी का नाम दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में इस 4% आरक्षण को जारी रखने की अनुमति दे दी, क्योंकि यह धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि पिछड़े वर्गों की पहचान के आधार पर था। यह मामला अब भी अंतिम फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में लंबित है।
पश्चिम बंगाल का मामला: कहां फंसा पेच?
पश्चिम बंगाल मेंएक अलग स्थिति देखने को मिली। जब राज्य सरकार ने कई मुस्लिम वर्गों को ओबीसी सूची में शामिल किया, तो कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह फैसला बिना किसी पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश के लिया गया था। कोर्ट ने इसे राजनीतिक तुष्टिकरण करार दिया, न कि वास्तविक पिछड़ेपन को दूर करने का प्रयास।
बीजेपी सांसद की मांग कितनी सही?
सुप्रीम कोर्ट नेकई फैसलों में यह साफ किया है कि सिर्फ तुष्टिकरण के लिए या केवल धर्म के नाम पर दिया गया आरक्षण संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। ऐसे आरक्षण की समीक्षा की मांग करना एक वैध संसदीय कार्य है।
लेकिन अगर इस मांग का मतलब यह है कि सभी मुसलमानों को ओबीसी कोटे से पूरी तरह बाहर कर दिया जाए, तो यह सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी फैसले के सीधे खिलाफ होगा। सुप्रीम कोर्ट पहले ही मान चुका है कि गैर-हिंदू धर्मों में भी सदियों से पिछड़े हुए समूह मौजूद हैं। उन्हें आरक्षण का हक है।
