इंतजार की वो एक दोपहर और हिंदी सिनेमा को मिली सबसे बड़ी संगीतकार जोड़ी, जानें शंकर-जयकिशन की अनसुनी दास्तां

Entertainment News: हिंदी सिनेमा के इतिहास में शंकर-जयकिशन की जोड़ी को संगीत का स्वर्ण युग माना जाता है। रियलिटी शो ‘इंडियन आइडल’ के हालिया मंच पर मशहूर गीतकार मनोज मुंतशिर ने इस महान जोड़ी के बनने की अविश्वसनीय कहानी साझा की। मुंतशिर ने बताया कि कैसे संघर्ष के दिनों में दो अनजान युवाओं की मुलाकात ने भारतीय फिल्म संगीत की दिशा बदल दी। आज भी इस जोड़ी के बनाए सदाबहार गाने दुनिया भर में करोड़ों लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं।

एक ऑफिस का कोना और दो अजनबियों की ऐतिहासिक दोस्ती

मनोज मुंतशिर ने बताया कि शंकरजी मूल रूप से हैदराबाद से काम की तलाश में मायानगरी मुंबई आए थे। वह एक फिल्म प्रोड्यूसर के दफ्तर के बाहर महीनों तक काम मिलने का इंतजार करते रहे। उसी दौरान उन्होंने देखा कि ऑफिस के सोफे पर जयकिशन नाम का एक लड़का चुपचाप बैठा रहता है। जब शंकरजी ने उससे परिचय पूछा, तो जयकिशन ने बताया कि वह हारमोनियम बजाते हैं और उन्हें भी काम की तलाश है। बस इसी मुलाकात ने एक अमर दोस्ती और संगीत की साझेदारी की नींव रख दी।

पृथ्वीराज कपूर की सरपरस्ती और राज कपूर का अटूट साथ

शंकरजी उस समय पृथ्वी थिएटर में तबला वादक के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने जयकिशन की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पृथ्वीराज कपूर के पास ले गए। शंकरजी ने बड़े गर्व से उन्हें ‘पापाजी’ से मिलवाया और जयकिशन को काम दिलाने में मदद की। बाद में राज कपूर ने अपनी फिल्म ‘आग’ के बाद अपनी दूसरी फिल्म के लिए इस युवा जोड़ी पर भरोसा जताया। राज कपूर के विजन और शंकर-जयकिशन की धुनों ने मिलकर आरके फिल्म्स को एक अलग पहचान दिलाई।

दशकों तक गूंजती रही शंकर-जयकिशन की सुरीली धुनों की जादुई खनक

50 से 70 के दशक के बीच इस जोड़ी ने ‘आवारा हूं’ और ‘बहारों फूल बरसाओ’ जैसे कालजयी गीत दिए। उनके गानों में शास्त्रीय संगीत और पश्चिमी धुनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता था। मनोज मुंतशिर ने याद दिलाया कि उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि सिनेमाघरों के बाहर संगीत सुनने के लिए कतारें लगती थीं। प्यार, विरह और खुशी के हर जज्बात को उन्होंने अपनी धुनों में पिरोया। आज भी नए दौर के संगीतकार उनकी धुनों से प्रेरणा लेकर संगीत तैयार करते हैं।

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