Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही ने अपना तकनीकी इस्तीफा वापस ले लिया है। यह वही अधिकारी हैं, जो मुजफ्फरनगर में भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने पर 7 गोलियां खाने के बाद भी सिस्टम से लड़ते रहे । राष्ट्रपति को भेजे इस्तीफे में उन्होंने दो बड़ी शर्तें रखी थीं। पहली, उन्हें काम नहीं तो वेतन भी नहीं चाहिए। दूसरी, उनका पुराना पद ‘समाज कल्याण अधिकारी’ वापस दिया जाए । करीब 9 महीने से राजस्व परिषद में बिना काम के बैठे राही ने कहा कि समानांतर सिस्टम चल रहा है । हालांकि, इस्तीफा वापसी की प्रक्रिया को बेहद गोपनीय रखा गया है ।
लखनऊ में ‘अटैच’ रहने का दर्द
रिंकू सिंह राही पिछले कई महीनों से लखनऊ स्थित राजस्व परिषद में अटैच थे। इस दौरान उन्हें कोई ठोस जिम्मेदारी नहीं दी गई । नौकरशाही की भाषा में इसे ‘वेटिंग’ या साइडलाइन करना कहा जाता है। सूत्रों के मुताबिक, राही को लग रहा था कि बिना काम वेतन लेना ईमानदारी के खिलाफ है । उन्होंने साफ कहा कि जनता के पैसे की बर्बादी वह बर्दाश्त नहीं कर सकते । इसी नैतिक बेचैनी ने उन्हें तकनीकी इस्तीफे जैसा कठोर फैसला लेने के लिए मजबूर कर दिया।
क्या है ‘तकनीकी इस्तीफे’ का गणित?
रिंकू सिंह ने सामान्य इस्तीफा नहीं दिया था, बल्कि ‘तकनीकी इस्तीफा’ भेजा था । इसका अर्थ है कि वे आईएएस सेवा को छोड़कर अपनी पुरानी पीसीएस कैडर की नौकरी में लौटना चाहते थे। उनका कहना था कि अगर आईएएस अधिकारी के तौर पर सेवा का मौका नहीं देना है तो उन्हें वापस उनकी पुरानी पोस्टिंग पर भेज दिया जाए । यह एक दुर्लभ कदम था, क्योंकि कोई भी अधिकारी आमतौर पर आईएएस की कुर्सी छोड़कर निचली सेवा में नहीं जाना चाहता, लेकिन राही के सिद्धांत अलग रहे हैं।
अखिलेश और चंद्रशेखर आजाद ने उठाए सवाल
रिंकू सिंह के इस्तीफे की खबरों ने राजनीति को भी हवा दे दी थी। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि ईमानदार अधिकारियों को साइडलाइन किया जा रहा है । वहीं, नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने इसे जातिगत उत्पीड़न से जोड़ दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “एक दलित आईएएस अफसर को काम न देकर इस्तीफा देने पर मजबूर करना, पूरे प्रशासनिक ढांचे पर सवाल खड़ा करता है।” मामला गर्माने के बाद ही शासन स्तर पर हलचल तेज हो गई थी।
वकीलों के सामने कान पकड़कर लगाई थी उठक-बैठक
रिंकू सिंह राही पहली बार जुलाई 2025 में सुर्खियों में आए थे। वे शाहजहांपुर के पुवायां तहसील में एसडीएम थे । निरीक्षण के दौरान उन्होंने एक मुंशी को खुले में पेशाब करते पकड़ा और उसे सजा के तौर पर उठक-बैठक लगवा दी। इस पर वकीलों ने जमकर विरोध किया। हालात शांत करने के लिए राही ने वहीं सबके सामने अपने कान पकड़कर उठक-बैठक लगाई और माफी मांगी । यह वीडियो वायरल हुआ, तो 24 घंटे के भीतर ही सरकार ने उनका तबादला राजस्व परिषद में कर दिया ।
2009 में 7 गोलियों ने बदल दी थी जिंदगी
रिंकू सिंह की ईमानदारी का अंदाजा 2009 के उस हमले से लगता है, जब वे मुजफ्फरनगर में समाज कल्याण अधिकारी थे । उन्होंने करोड़ों रुपये की छात्रवृत्ति घोटाले का भंडाफोड़ किया था। इससे नाराज माफियाओं ने 26 मार्च 2009 को उन पर जानलेवा हमला कर दिया । इस हमले में उन्हें सात गोलियां लगीं, जिससे उनका चेहरा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और एक आंख की रोशनी चली गई । कई सर्जरी के बाद वे ठीक हुए, लेकिन ईमानदारी का जज्बा नहीं छोड़ा।
पीसीएस से आईएएस तक का संघर्ष
अलीगढ़ के रहने वाले रिंकू सिंह ने 2004 में यूपीपीसीएस परीक्षा पास की और जिला समाज कल्याण अधिकारी बने । नौकरी के दौरान भी उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी जारी रखी। कुल 16 प्रयासों के बाद, अंततः उन्होंने 2023 में दिव्यांगता कोटे से यूपीएससी क्रैक किया । ट्रेनिंग पूरी करने के बाद 2025 में एसडीएम के तौर पर उनकी पहली नियुक्ति शाहजहांपुर में हुई । लेकिन विवाद के चलते मात्र 36 घंटों में ही उन्हें हटाकर राजस्व परिषद भेज दिया गया ।
