Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में आपदा राहत और पुनर्वास कार्यों के लिए निर्धारित सीएसआर (CSR) फंड के उपयोग में बड़ी खामियां पकड़ी हैं। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार सहित सार्वजनिक उपक्रमों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। उद्योग विभाग के हलफनामे के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान कंपनियों के अनिवार्य सीएसआर खर्च में लगभग 100 करोड़ रुपये की भारी कमी दर्ज की गई है।
डिफॉल्टर कंपनियों पर चलेगा कानूनी हंटर
अदालत ने साफ किया है कि जो कंपनियां अपने कानूनी दायित्वों को निभाने में विफल रही हैं, उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई शुरू की जाए। खंडपीठ ने चेतावनी दी कि यदि अगली सुनवाई तक ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भारत सरकार और राज्य सरकार दोनों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को पिछले तीन वर्षों का पूरा ब्योरा देने का आदेश दिया है। इसमें उन सभी कंपनियों की सूची शामिल होगी जो सेक्शन 135 के दायरे में आती हैं।
आपदा प्रबंधन में पारदर्शिता पर उठे सवाल
हाईकोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि 2023 से 2025 के बीच लगातार आपदाएं झेलने के बावजूद सरकार के पास सटीक डेटा उपलब्ध नहीं है। केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह एनटीपीसी, एनएचपीसी और एसजेवीएन जैसे बड़े सार्वजनिक उपक्रमों के खर्च न किए गए फंड की स्थिति स्पष्ट करे। अदालत ने पूछा है कि क्या आपदा के बाद पुनर्वास कार्यों के लिए कोई एक समान नीति बनाई गई है। कोर्ट ने सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों की मरम्मत की जिलावार सूची भी मांगी है।
भर्ती कानून को चुनौती: आज आएगा बड़ा फैसला
एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, हिमाचल हाईकोर्ट शनिवार को सरकारी कर्मचारी भर्ती एवं सेवा शर्त विधेयक 2024 पर अपना निर्णय सुनाएगा। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रोमेश वर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। याचिकाकर्ताओं ने इस कानून को असंवैधानिक बताते हुए इसे खारिज करने की मांग की है। वहीं, राज्य सरकार का तर्क है कि यह अधिनियम नियमित और अनुबंध कर्मचारियों के बीच स्पष्ट अंतर पैदा करने के उद्देश्य से लाया गया है।
