New Delhi News: भारत में निजी और सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए छुट्टियों के नियम अब पूरी तरह बदलने वाले हैं। केंद्र सरकार के नए लेबर कोड (Labour Codes) लागू होने के बाद, छुट्टी अब सिर्फ आराम का जरिया नहीं बल्कि कमाई का साधन भी बनेगी। नए नियमों के तहत लीव एनकैशमेंट यानी छुट्टियों के बदले पैसे लेने की प्रक्रिया को काफी सरल और फायदेमंद बनाया गया है। अब कर्मचारियों को अपनी अर्जित छुट्टियों का लाभ साल के अंत में भी मिल सकेगा।
30 दिन से ज्यादा छुट्टी होने पर मिलेगा पैसा
नए लेबर कोड की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब छुट्टियां जमा करने की एक सीमा तय होगी। पहले ज्यादातर कंपनियों में केवल नौकरी छोड़ते समय ही लीव एनकैशमेंट की सुविधा मिलती थी। अब नए नियमों के अनुसार, यदि किसी कर्मचारी की अर्जित छुट्टियां 30 दिन से अधिक हो जाती हैं, तो वह साल के अंत में अतिरिक्त छुट्टियों के बदले नकद भुगतान की मांग कर सकता है। इससे कर्मचारियों को अपनी बचत के साथ-साथ वित्तीय सुरक्षा भी मिलेगी।
हर 20 दिन के काम पर मिलेगी एक छुट्टी
नए कानून के तहत छुट्टियों की गणना का आधार भी तय कर दिया गया है। कर्मचारियों को अब संस्थान में हर 20 दिन काम करने पर एक दिन की अर्जित छुट्टी (Earned Leave) दी जाएगी। हालांकि, कैजुअल लीव और बीमारी के लिए मिलने वाली छुट्टियों को लेकर नियम पुराने ही रहेंगे। इन्हें साल के अंत में कैश नहीं कराया जा सकेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव कर्मचारियों के अधिकारों को वैश्विक मानकों के करीब ले आएगा।
मैनेजमेंट ने छुट्टी देने से किया मना, तो होगा बड़ा फायदा
एक दिलचस्प नियम यह भी है कि यदि कोई मालिक कर्मचारी की छुट्टी नामंजूर करता है, तो वह छुट्टी असीमित रूप से आगे बढ़ेगी। यानी ऐसी छुट्टियों के जमा होने की कोई ऊपरी सीमा नहीं होगी। यह नियम नियोक्ताओं को मनमाने ढंग से छुट्टियां रद्द करने से रोकेगा। इस्तीफा, रिटायरमेंट या छंटनी की स्थिति में बची हुई सभी अर्जित छुट्टियों का पूरा भुगतान करना अब कंपनियों के लिए अनिवार्य होगा। इससे विवादों में कमी आने की संभावना है।
राज्यों के पुराने नियमों और नए कोड में अंतर
फिलहाल देश में राज्यों के ‘शॉप्स एंड एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट’ और ‘फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948’ जैसे पुराने कानून प्रभावी हैं। तेलंगाना जैसे राज्यों ने पहले ही कुछ श्रेणियों के लिए नौकरी के दौरान ही पैसे लेने की सुविधा दी है। लेकिन नए केंद्रीय लेबर कोड पूरे भारत में एकरूपता लाएंगे। अब लीव एनकैशमेंट की गणना नई ‘मजदूरी’ (Wage) की परिभाषा के आधार पर होगी। कंपनियों को कानूनी विवादों से बचने के लिए अपनी एचआर नीतियों को जल्द बदलना होगा।
