Entertainment News: भारतीय संगीत जगत में 1960 के दशक को ‘ओपी नय्यर युग’ के रूप में याद किया जाता है। अपनी धुनों से ‘हिट मशीन’ कहलाने वाले नय्यर साहब का स्वभाव उनके संगीत की तरह ही बेहद तेज और आक्रामक था। संगीत की दुनिया में वे इकलौते ऐसे दिग्गज संगीतकार रहे, जिन्होंने स्वर कोकिला लता मंगेशकर के साथ कभी कोई गाना रिकॉर्ड नहीं किया। संगीत प्रेमियों के बीच दशकों से यह सवाल कौतूहल का विषय बना रहा कि आखिर इन दो दिग्गजों के रास्ते अलग क्यों रहे।
एक छोटी सी चूक और ताउम्र की दूरियां
इस अनूठी दूरी की शुरुआत साल 1952 में फिल्म ‘आसमान’ की रिकॉर्डिंग के दौरान हुई थी। नय्यर साहब चाहते थे कि लता जी उनकी धुन को आवाज दें, जिसके लिए समय और तारीख भी तय हो चुकी थी। हालांकि, किन्हीं कारणों से लता मंगेशकर उस रिकॉर्डिंग पर नहीं पहुंच पाईं। नय्यर साहब को यह बात इतनी चुभ गई कि उन्होंने दोबारा कभी उनके साथ काम न करने का फैसला कर लिया। खुद लता जी ने भी स्वीकार किया था कि वह रिकॉर्डिंग पर नहीं जा सकी थीं।
मोहम्मद रफी और किशोर कुमार भी हुए गुस्से के शिकार
ओपी नय्यर का गुस्सा इतना मशहूर था कि गायक माइक के सामने खड़े होने से कतराते थे। उनके तीखे व्यवहार के कारण एक समय मोहम्मद रफी ने भी उनके लिए गाना बंद कर दिया था। रिकॉर्डिंग के दौरान नय्यर अक्सर शीशे के पार से गायकों पर चिल्ला दिया करते थे। उन्होंने एक बार किशोर कुमार को पूरी महफिल में ‘बेसुरा’ कहकर डांट दिया था। संगीत की बारीकियों को लेकर उनका जुनून अक्सर उनके गुस्से का कारण बनता था, जिससे कई कलाकार सहम जाते थे।
आशा भोंसले के साथ बनी सबसे सफल जोड़ी
लता जी के साथ काम न करने के बावजूद नय्यर ने आशा भोंसले के साथ संगीत के नए आयाम छुए। आशा जी ने खुद माना था कि नय्यर साहब बेहद आक्रामक थे, लेकिन उनके संगीत में एक अलग ही जादू था। गीतकार एसएच बिहारी के लिखे ‘चैन से हमको कभी’ जैसे गानों ने उनकी बॉन्डिंग को अमर बना दिया। नय्यर साहब की सफलता का ग्राफ इतना ऊंचा था कि ‘उड़े जब-जब जुल्फें तेरी’ जैसे गाने आज भी लोगों की जुबान पर बसे हुए हैं।
लता मंगेशकर को माना हमेशा ‘नंबर वन’
भले ही दोनों ने कभी स्टूडियो साझा नहीं किया, लेकिन ओपी नय्यर के दिल में लता जी के लिए अपार सम्मान था। एक साक्षात्कार में उन्होंने कसम खाकर कहा था कि लता मंगेशकर भारत की नंबर एक गायिका हैं और उनकी जगह कोई नहीं ले सकता। उन्होंने स्वीकार किया था कि मदन मोहन और रोशन जैसे संगीतकारों की गजलें केवल लता की आवाज में ही उस ऊंचाई तक पहुंच सकीं। यह एक महान कलाकार की दूसरे महान कलाकार के प्रति सच्ची और ईमानदार श्रद्धांजलि थी।


