Tehran News: अमेरिका और ईरान के बीच ठनी जंग अब उस मुहाने पर आ खड़ी हुई है, जहां से वापसी का रास्ता नजर नहीं आता। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस युद्ध को महज 2 से 4 दिन का खेल समझा था, उसे आज पूरे 30 दिन बीत चुके हैं। हालात सुधरने के बजाय और ज्यादा बिगड़ गए हैं। सोमवार को मिडिल ईस्ट में एक ऐसी आग भडकने की आशंका है, जो पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकती है। तेहरान ने तबाही का नया अलर्ट जारी कर दिया है और ट्रंप के ‘तबाही प्लान’ ने खाड़ी देशों की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
ट्रंप का अल्टीमेटम बनाम ईरान की चुनौती
मिडिल ईस्ट में अब सिर्फ डेडलाइन का खेल चल रहा है। व्हाइट हाउस की ओर से 6 अप्रैल की रात 8 बजे का समय तय किया गया है। यानी अमेरिका अभी 7 दिन और इंतजार करने की बात कह रहा है। ट्रंप का इरादा साफ है कि अगर ईरान ने उनकी शर्तें नहीं मानीं, तो ‘नर्क के दरवाजे’ खोल दिए जाएंगे। दूसरी तरफ ईरान ने पलटवार के लिए महज 18 घंटे की मोहलत दी है। तेहरान की डेडलाइन 30 मार्च दोपहर 12 बजे खत्म हो रही है। ईरान का दावा है कि उसके ड्रोन और मिसाइलों ने इजरायल और अमेरिकी डिफेंस सिस्टम की पोल खोल दी है।
तेहरान यूनिवर्सिटी पर हमला और भड़का गुस्सा
ईरान के इस कड़े रुख के पीछे तेहरान यूनिवर्सिटी पर हुई बमबारी है। इस घटना के बाद ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) का गुस्सा सातवें आसमान पर है। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने इस हमले की निंदा नहीं की और माफी नहीं मांगी, तो वह खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी शिक्षण संस्थानों को निशाना बनाएगा। इस धमकी ने कुवैत, कतर और यूएई जैसे देशों को गहरे सदमे में डाल दिया है। उन्हें डर है कि 30 मार्च को ईरान अब तक का सबसे भीषण हमला कर सकता है।
पेंटागन की तैयारी: क्या शुरू होगा ग्राउंड ऑपरेशन?
वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट ने दुनिया की चिंता और बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, पेंटागन अब केवल हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहना चाहता। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय अब जमीन पर उतरकर युद्ध (Ground Operation) करने की योजना बना रहा है। ट्रंप किसी भी कीमत पर अपनी हार स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। इसलिए मिडिल ईस्ट में तैनात 50 हजार सैनिकों के अलावा, 1500 अतिरिक्त जवानों की खेप भेजी गई है। ट्रंप की कोशिश है कि ईरान को घुटनों पर लाया जाए, भले ही इसके लिए कितनी भी बड़ी कीमत चुकानी पड़े।
खार्ग आइलैंड और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर नजर
अमेरिकी सैन्य रणनीति के अनुसार, 4500 मरीन्स और 82वीं एयरबोर्न डिवीजन के 4000 पैराट्रूपर्स की तैनाती की जा रही है। अगर बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद हुआ, तो अमेरिकी सेना ईरान के तटीय इलाकों पर धावा बोल सकती है। इसमें खार्ग आइलैंड, हॉर्मुज स्ट्रेट, किश और बांदर अब्बास जैसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकाने शामिल हैं। इन इलाकों पर कब्जा करके अमेरिका ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ना चाहता है।
ईरान का ‘माइन ट्रैप’ और पलटवार की तैयारी
ईरान भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है। उसने अपने सभी द्वीपों पर सुरक्षा घेरा सख्त कर दिया है। समुद्र के भीतर माइंस (सुरंगों) का जाल बिछा दिया गया है ताकि अमेरिकी नौसेना को रोका जा सके। ईरान के डिफेंस सिस्टम हाई अलर्ट पर हैं। सैन्य जानकारों का मानना है कि अगर ट्रंप ग्राउंड ऑपरेशन का जोखिम उठाते हैं, तो यह उनके लिए आत्मघाती भी हो सकता है। क्योंकि अमेरिकी सैनिकों को न केवल माइंस से निपटना होगा, बल्कि ईरानी ड्रोन और मिसाइलों के निरंतर हमलों का सामना भी करना पड़ेगा। इस तनाव ने दुनिया भर में ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा रही है।


