World News: दुनिया में तेल का खेल अब एक नए मोड़ पर आ गया है। लाल सागर और होर्मुज मार्ग में तनाव चरम पर है। ईरान और हूती विद्रोहियों के खौफ से समुद्री जहाजों ने अपनी राह बदल ली है। अब तेल और मालवाहक जहाज ‘केप ऑफ गुड होप’ के रास्ते गुजर रहे हैं। अटलांटिक और हिंद महासागर को जोड़ने वाले इस रूट पर जहाजों की भारी भीड़ जमा हो गई है। यह वही ऐतिहासिक रास्ता है, जिससे कभी वास्कोडिगामा भारत पहुंचा था।
हूती और ईरान के डर से बदल गया दुनिया का नक्शा
ईंधन सप्लाई के लिए होर्मुज स्ट्रेट और बाब अल-मंडेब सबसे अहम माने जाते हैं। होर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच मौजूद है। दुनिया की 30 प्रतिशत ऊर्जा इसी रास्ते से सप्लाई होती है। लेकिन अब यहां ईरान की मर्जी के बिना कोई पत्ता नहीं हिलता। हूती विद्रोहियों ने बाब अल-मंडेब पर अपना खौफ कायम कर रखा है। यहां से पूरी दुनिया को 10 प्रतिशत तेल मिलता है। सुरक्षा के डर से जहाजों ने इन अहम रास्तों से किनारा कर लिया है।
500 साल पुराने रास्ते पर लौटने को मजबूर हुई दुनिया
खतरे को देखते हुए जहाज कंपनियों ने ‘केप ऑफ गुड होप’ का रुख किया है। इसी रास्ते से साल 1498 में वास्कोडिगामा पहली बार भारत आया था। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि इस मार्ग पर जहाजों का दबाव काफी बढ़ गया है। यहां से अब हर दिन औसतन 150 मालवाहक जहाज गुजर रहे हैं। यह संख्या आम दिनों के मुकाबले 30 प्रतिशत तक ज्यादा है। जून 2025 में ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध के समय भी इसी रूट का इस्तेमाल बढ़ा था।
लंबा रास्ता तय करने से बढ़ रही दुनिया भर में महंगाई
केप ऑफ गुड होप का रास्ता सुरक्षित जरूर है, लेकिन यह काफी महंगा है। केपटाउन के समुद्री अर्थशास्त्री ब्रायन इंग्पेन ने इसे लेकर बड़ी चेतावनी दी है। उनका कहना है कि दक्षिणी अफ्रीका से गुजरने वाला समुद्री यातायात दोगुना हो सकता है। लंबा रास्ता होने के कारण जहाजों को ईंधन और स्टाफ पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। ब्रायन के मुताबिक, माल ढुलाई का खर्च 30 से 70 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इससे पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है।
क्या अमेरिका निकाल पाएगा इस बड़े संकट का कोई ठोस समाधान?
पूरी दुनिया इस वक्त होर्मुज विवाद के शांत होने का इंतजार कर रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट के समाधान के संकेत दिए हैं। ट्रंप का दावा है कि होर्मुज पर कब्जा किए बिना भी इस जंग को रोका जा सकता है। देखना होगा कि कूटनीति के जरिए यह रास्ता कब तक पूरी तरह सुरक्षित हो पाता है। फिलहाल तो दुनिया को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

