ईरान-अमेरिका जंग में ‘बिचौलिए’ की भूमिका निभा रहा पाकिस्तान? ब्रिटिश अखबार की रिपोर्ट ने खोली शहबाज सरकार की पोल

India News: ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव में सीजफायर की कोशिशों को लेकर पाकिस्तान की असल भूमिका अब वैश्विक मंच पर चर्चा का विषय बन गई है। खुद को ‘शांति दूत’ के रूप में पेश करने वाले इस्लामाबाद को लेकर ब्रिटिश अखबार ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान एक स्वतंत्र मध्यस्थ नहीं, बल्कि वाशिंगटन के एक सुविधाजनक संदेशवाहक यानी मैसेंजर के तौर पर काम कर रहा है।

व्हाइट हाउस के दबाव में काम कर रहा इस्लामाबाद

फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि व्हाइट हाउस ने पाकिस्तान पर दबाव डालकर उसे अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद कोई निष्पक्ष मध्यस्थ (Neutral Broker) नहीं है, बल्कि वह अमेरिका के प्रस्तावों को तेहरान तक पहुँचाने वाला एक जरिया मात्र है। वाशिंगटन ने जानबूझकर एक मुस्लिम पड़ोसी देश का चुनाव किया ताकि ईरान को अमेरिकी प्रस्तावों पर राजी करना मनोवैज्ञानिक रूप से आसान हो सके और बातचीत आगे बढ़ सके।

सेना प्रमुख आसिम मुनीर के हाथों में कमान

पाकिस्तान की इस कूटनीतिक सक्रियता के पीछे वहां की चुनी हुई सरकार से ज्यादा सैन्य नेतृत्व का हाथ नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भले ही दो सप्ताह के सीजफायर का सार्वजनिक प्रस्ताव रखा, लेकिन पर्दे के पीछे असली खेल सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर खेल रहे हैं। मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वांस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के साथ सीधा संवाद स्थापित किया है, जबकि प्रधानमंत्री शरीफ की भूमिका सीमित रही।

शहबाज शरीफ की ‘कॉपी-पेस्ट’ गलती ने उजागर की सच्चाई

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने पाकिस्तान की कूटनीतिक पोल खोल दी है। सीजफायर की घोषणा करते समय उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक संदेश साझा किया, जिसमें गलती से ‘ड्राफ्ट-पाकिस्तान्स पीएम मैसेज ऑन एक्स’ लिखा रह गया था। हालांकि इसे बाद में हटा दिया गया, लेकिन इसके स्क्रीनशॉट वायरल हो गए। इस चूक से यह साबित हो गया कि पाकिस्तान के पास अपना कोई स्वतंत्र विजन नहीं है और वह केवल दूसरे का लिखा हुआ संदेश प्रचारित कर रहा है।

एस जयशंकर का पुराना दावा हुआ सच

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने काफी पहले ही पाकिस्तान की इस भूमिका पर कटाक्ष किया था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि भारत कोई ‘बिचौलिया’ या दलाल देश नहीं है। जयशंकर ने याद दिलाया था कि पाकिस्तान का इतिहास बड़े देशों के लिए काम करने का रहा है। 1971 में चीन-अमेरिका और 1981 में अमेरिका-ईरान के बीच भी पाकिस्तान ने इसी तरह की भूमिका निभाई थी। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट अब जयशंकर के उन दावों पर मुहर लगाती दिख रही है।

लेबनान मुद्दे पर अमेरिका और इजराइल का रुख

पाकिस्तान ने दावा किया था कि इस सीजफायर समझौते में लेबनान भी शामिल है, लेकिन अमेरिका और इजराइल ने इसे नकार दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि मौजूदा युद्धविराम लेबनान के मोर्चे को कवर नहीं करता है। इस वजह से इजराइल लगातार हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले कर रहा है। पाकिस्तान की यह गलतबयानी उसकी कूटनीतिक विफलता को दर्शाती है, क्योंकि वह अंतरराष्ट्रीय समझौतों की बारीकियों को समझने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

ईरान की नाराजगी और वैश्विक तेल संकट का खतरा

इजराइल द्वारा लेबनान पर हमले जारी रहने से ईरान बेहद गुस्से में है। तेहरान ने चेतावनी दी है कि यदि हमले नहीं रुके तो वह सीजफायर समझौते से बाहर निकल सकता है। ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से बंद करने की धमकी दी है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जीवन रेखा मानी जाती है। यदि यह जलडमरूमध्य बंद होता है, तो दुनिया भर में ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा।

भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और पाकिस्तान की मजबूरी

पाकिस्तान की वर्तमान स्थिति उसकी कमजोर आर्थिक और स्वतंत्र कूटनीति का परिणाम मानी जा रही है। इसके विपरीत, भारत ने अपनी नीति को बेहद स्पष्ट और संतुलित रखा है। जयशंकर के नेतृत्व में भारत ने अमेरिका, ईरान और इजराइल के साथ अपने रिश्तों को बिना किसी के दबाव में आए बेहतर बनाए रखा है। रिपोर्ट यह साफ करती है कि बड़े देश पाकिस्तान को केवल अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं, जबकि भारत अपनी शर्तों पर वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।

ब्रिटिश अखबार की इस रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान जंग में सीजफायर को लेकर पाकिस्तान की सक्रियता उसकी अपनी कूटनीतिक ताकत नहीं है। वह केवल अमेरिका के एक ‘रट्टू तोते’ की तरह काम कर रहा है। सऊदी अरब पर हुए ड्रोन हमलों के बाद पाकिस्तान की तटस्थता का नाटक भी अब बेनकाब हो चुका है। आगामी दिनों में इस्लामाबाद में होने वाली प्रत्यक्ष बातचीत यह तय करेगी कि यह अस्थायी शांति कितनी लंबी टिक पाएगी।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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