Japan News: अमेरिका और ईरान के बीच छिड़े भीषण युद्ध ने अब जापान की रातों की नींद उड़ा दी है। जापान ने चीन और उत्तर कोरिया के बढ़ते खतरों से निपटने के लिए अमेरिका को 400 टॉमहॉक मिसाइलों का ऑर्डर दिया था। करीब 2.35 अरब डॉलर का यह सौदा अब अधर में लटकता नजर आ रहा है। असल में, ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका ने अपनी सैकड़ों टॉमहॉक मिसाइलें दाग दी हैं। इससे अमेरिकी सेना का अपना स्टॉक (इन्वेंट्री) तेजी से खाली हो रहा है। यही वजह है कि अमेरिका ने अब अपनी जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए जापान की डिलीवरी में देरी होने के संकेत दिए हैं।
युद्ध में स्वाहा हुई अमेरिका की दो साल की उत्पादन क्षमता
अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, युद्ध शुरू होने से पहले वाशिंगटन के पास करीब 4000 टॉमहॉक मिसाइलें थीं। लेकिन ईरान और मध्य पूर्व के मोर्चे पर जिस तरह से मिसाइलें खर्च हुई हैं, उसने अमेरिका की दो साल की उत्पादन क्षमता को खत्म कर दिया है। जापान की रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी ने स्वीकार किया है कि अमेरिका ने अब ईरान युद्ध को प्राथमिकता दी है। टॉमहॉक मिसाइलें 1600 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम हैं। ये जापान की नई ‘काउंटर-स्ट्राइक’ रक्षा रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। डिलीवरी में हो रहे इस व्यवधान से जापान की सैन्य योजनाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।
अमेरिका में उत्पादन की सुस्त रफ्तार बनी बड़ी मुसीबत
जापान ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और नीदरलैंड जैसे अमेरिकी सहयोगी भी आपूर्ति की समस्या से जूझ रहे हैं। अमेरिका में टॉमहॉक का उत्पादन फिलहाल काफी धीमा है। साल 2025 में वहां केवल 100 नई मिसाइलें ही बन पाई हैं। पेंटागन हर साल 1000 मिसाइलें बनाने का लक्ष्य रख रहा है, लेकिन इसमें अभी कई साल लग सकते हैं। ट्रंप प्रशासन की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत भी पहले अमेरिकी सेना की जरूरतों को पूरा किया जा रहा है। इसी बीच ओकिनावा से 3500 अमेरिकी सैनिकों को ईरान युद्ध के लिए भेजने से एशियाई देश अपनी सुरक्षा को लेकर और अधिक चिंतित हो गए हैं।
स्वदेशी तकनीक बनी जापान के लिए ‘संजीवनी’
टॉमहॉक की डिलीवरी में देरी को देखते हुए जापान ने अब अपनी स्वदेशी मिसाइलों पर ध्यान केंद्रित किया है। जापान ने अपनी ‘टाइप-12’ मिसाइलों का विकास तेज कर दिया है। ये मिसाइलें 1000 किलोमीटर तक दुश्मन को निशाना बना सकती हैं। हाल ही में इन्हें कुमामोटो में तैनात भी किया गया है। इसके अलावा जापान ने हाइपर वेलोसिटी ग्लाइडिंग प्रोजेक्टाइल पर भी काम शुरू कर दिया है। पूर्व रक्षा अधिकारी हिरोहितो ओगी का मानना है कि स्वदेशी मिसाइलों का विकास ही अब टॉमहॉक की कमी को पूरा करने का सबसे बेहतर विकल्प है।

