Washington News: अमेरिका और ईरान के बीच अचानक हुए सीजफायर ने दुनिया को हैरत में डाल दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे विश्व शांति की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम बता रहे हैं। हालांकि कूटनीति के कई बड़े विशेषज्ञ इस शांति समझौते को पूरी तरह अवास्तविक मान रहे हैं। दोनों देश इस समझौते को लेकर बिल्कुल विरोधाभासी दावे कर रहे हैं। इस घटनाक्रम में मध्यस्थ देश पाकिस्तान की संदिग्ध भूमिका पर बहुत गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
पाकिस्तान के मध्यस्थ बनने पर उठे बड़े सवाल
वाशिंगटन स्थित एफडीडी के कार्यकारी निदेशक जोनाथन शांजर ने इस समझौते पर बड़ी हैरानी जताई है। उन्होंने इस पूरे शांति समझौते के सूत्रधार पाकिस्तान की भूमिका को बहुत अजीब बताया है। शांजर के अनुसार पाकिस्तान हमेशा से आतंकवाद का मुख्य प्रायोजक देश रहा है। ऐसे में उसका अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने के लिए आगे आना बहुत ही असामान्य घटना है। विशेषज्ञ अब समझ रहे हैं कि पाकिस्तान ने अचानक इतनी बड़ी कूटनीतिक सक्रियता क्यों दिखाई है।
ईरान और अमेरिका के दावों में भारी विरोधाभास
इस वर्तमान सीजफायर की सबसे बड़ी चिंता दोनों देशों के विरोधाभासी दावे हैं। अमेरिका और ईरान इस अहम समझौते की बिल्कुल अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं। ईरान इस पूरी संधि को अमेरिका के पूर्ण आत्मसमर्पण के रूप में पेश कर रहा है। ईरान का दावा है कि अमेरिका कड़े प्रतिबंध हटाने और युद्ध का हर्जाना देने के लिए मान गया है। वहीं ईरान यह भी कह रहा है कि अमेरिकी सेना अब पूरी तरह से पश्चिम एशिया को छोड़ देगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति की शर्तों पर विशेषज्ञों का संदेह
ईरान के दावों के विपरीत अमेरिका इस समझौते की अलग कहानी बता रहा है। अमेरिका का स्पष्ट कहना है कि यह केवल दो सप्ताह का एक छोटा युद्धविराम है। ट्रंप प्रशासन के अनुसार यह समझौता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने की सख्त शर्त पर आधारित है। जोनाथन शांजर ने ईरान के बड़े दावों को पूरी तरह से अवास्तविक और झूठा करार दिया है। उन्होंने यह सवाल उठाया है कि क्या ईरान सच में होर्मुज में जहाजों को सुरक्षित गुजरने देगा।
क्या अमेरिका बड़े हमले की तैयारी कर रहा है?
ट्रंप का अपनी ही धमकियों से अचानक पीछे हट जाना कई सवाल खड़े करता है। रक्षा विशेषज्ञ अमेरिका की वर्तमान रणनीति को लेकर बहुत ज्यादा संशय में हैं। वे यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या अमेरिका सच में रणनीति बदल रहा है। कई लोगों का यह भी मानना है कि यह कोई अंतिम शांति समझौता नहीं है। यह सीजफायर ईरान पर नए सिरे से हमला करने के लिए समय जुटाने की एक बड़ी अमेरिकी कूटनीति है।

