ईरान ने ठुकराया अमेरिका का ऑफर, क्या फिर भड़केगी खाड़ी में महायुद्ध की आग?

World News: ईरान ने इस्लामाबाद में अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ शांति वार्ता से साफ इनकार कर दिया है। इससे दुनिया भर में एक बार फिर युद्ध की चिंता बढ़ गई है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसका कोई प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान नहीं गया है। कूटनीतिक जानकार मानते हैं कि भारी तनाव के बावजूद अमेरिका और ईरान जल्द सीजफायर चाहते हैं। दुनिया की नजरें अब अगले कूटनीतिक कदम पर टिकी हैं। खाड़ी देशों में शांति बहाल करना इस समय विश्व के बड़े नेताओं के लिए सबसे प्रमुख और बड़ी चुनौती बन गया है।

बातचीत में देरी लेकिन सीजफायर की उम्मीद

विशेषज्ञ अशोक सज्जनहार मानते हैं कि इस्लामाबाद वार्ता में कुछ रुकावटें आई हैं। इससे शांति बैठक में देरी संभव है। लेकिन अमेरिका की तरह ईरान भी जल्द युद्धविराम चाहता है। शनिवार की प्रस्तावित बैठक के बाद माहौल का अंदाजा लगेगा। शुरुआत में ही बड़े नतीजे की उम्मीद करना जल्दबाजी है। मौजूदा समय में होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलना बेहद अहम है। वहां की सभी रुकावटें खत्म करके व्यापारिक मार्ग सुरक्षित बनाना प्राथमिकता है।

हमलों को रोकना है सबसे बड़ी प्राथमिकता

विशेषज्ञों के अनुसार इस समय मुख्य ध्यान नए हमलों को रोकने पर होना चाहिए। ईरान की तरफ से इजरायल या खाड़ी देशों पर कोई हमला नहीं हो। इजरायल और अमेरिका को भी ईरान पर जवाबी कार्रवाई से बचना होगा। यही दोनों मुद्दे इस समय सबसे महत्वपूर्ण हैं। बाकी मामलों पर शांति से बाद में चर्चा हो सकती है। दुनिया के बड़े देश इस क्षेत्र में आर्थिक ठिकानों और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर काफी चिंतित हैं।

जयशंकर की कूटनीतिक यात्रा के मायने

विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मॉरीशस और यूएई यात्रा का रणनीतिक महत्व है। मॉरीशस की इंडियन ओशन कॉन्फ्रेंस में भारत ने खुद को अहम सुरक्षा सहयोगी साबित किया है। यूएई के साथ भारत के रिश्ते पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं। यूएई भारत को तेल सप्लाई करने वाला एक बेहद अहम देश है। यह भारत के लिए दूसरा सबसे बड़ा निर्यात बाजार और अहम निवेशक भी है। वहां तीस लाख से अधिक भारतीय रहते हैं।

खाड़ी देशों से सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति

भारत इस क्षेत्र में अपने हितों को लेकर पूरी तरह सतर्क है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इसी रणनीति के तहत कतर का दौरा किया। भारत अपनी रसोई गैस की बड़ी जरूरत खाड़ी देशों से पूरी करता है। इसमें कतर की भूमिका काफी अहम है। राजनयिक यात्राओं का मुख्य मकसद आपसी रिश्तों को मजबूत करना है। सरकार बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब से बिना रुकावट एनर्जी सप्लाई सुनिश्चित करना चाहती है। भारतीयों की सुरक्षा भी प्राथमिकता है।

लेबनान और हिजबुल्लाह का अलग संघर्ष

लेबनान की स्थिति को लेकर वैश्विक स्तर पर अलग-अलग राय आ रही हैं। अमेरिका और इजरायल स्पष्ट मानते हैं कि इजरायल इस सीजफायर का हिस्सा नहीं है। वहीं ईरान और पाकिस्तान का रुख इससे अलग है। कई यूरोपीय देश लेबनान को भी शांति वार्ता में शामिल करना चाहते हैं। लेबनान में हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच अक्टूबर से भारी संघर्ष चल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार लेबनान के इस पुराने संघर्ष को नए युद्ध से अलग रखना चाहिए।

भारत और अमेरिका की मजबूत साझेदारी

विक्रम मिस्री की हालिया वॉशिंगटन डीसी यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों की समीक्षा करना था। टेक्नोलॉजी, रक्षा और व्यापार के क्षेत्र में अमेरिका भारत का एक बहुत ही महत्वपूर्ण साझेदार है। वहां रहने वाला विशाल भारतीय समुदाय भी अमेरिकी नीतियों में काफी प्रभावशाली है। इस आधिकारिक यात्रा का लक्ष्य यह तय करना था कि दुनिया में चल रहे भारी संघर्षों के बावजूद दोनों देशों के मजबूत रिश्ते एकदम सही दिशा में आगे बढ़ते रहें।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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