World News: अमेरिका और इजरायल के साथ जारी युद्ध के बीच ईरान की संसद में परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) से हटने का प्रस्ताव पेश किया गया है। ईरानी सांसद मालेक शरियाती ने बताया कि इस विधेयक में देश की परमाणु नीति में बड़े बदलाव शामिल हैं। इसमें एनपीटी से बाहर निकलना, पिछले परमाणु समझौते की प्रतिबद्धताओं को रद्द करना और सहयोगी देशों के साथ नए अंतरराष्ट्रीय ढांचे का समर्थन करना शामिल है।
युद्ध के बीच संसद की बैठक नहीं, अनिश्चितता बरकरार
यह प्रस्ताव ऐसेसमय आया है जब अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों की शुरुआत के बाद से ईरान की संसद की बैठक नहीं हुई है। ऐसे में इस विधेयक पर औपचारिक बहस और पारित होने की तारीख को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ईरान की परमाणु रणनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है।
क्या है एनपीटी और क्यों है यह संधि विवादित?
एनपीटीयानी परमाणु अप्रसार संधि 1968 में बनाई गई थी और 1970 में लागू हुई। इसका मकसद परमाणु हथियारों का प्रसार रोकना, निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना और शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना है। यह संधि सिर्फ पांच देशों (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) को परमाणु हथियार संपन्न मानती है। भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं क्योंकि इसे भेदभावपूर्ण माना जाता है।
न्यूक्लियर ट्रायड क्या है और भारत की क्या स्थिति?
न्यूक्लियर ट्रायड यानीपरमाणु त्रिकोण एक सैन्य रणनीति है। इसमें परमाणु हथियारों को तीन अलग-अलग माध्यमों से तैनात किया जाता है: जमीनी मिसाइलें, पनडुब्बी आधारित मिसाइलें और हवाई हमले की क्षमता। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई के लिए कम से कम एक माध्यम सुरक्षित रहे। भारत ने हाल के वर्षों में अपनी न्यूक्लियर ट्रायड को मजबूत किया है और ‘पहले हमला न करने’ की नीति अपनाई है।
एनपीटी की क्या हैं खामियां?
एनपीटीमें कई कमजोरियां हैं। संधि में एक अनुच्छेद यह भी है कि कोई राज्य असाधारण परिस्थितियों में तीन महीने की सूचना पर संधि से हट सकता है। निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया में सुस्ती देखी गई है। कई देशों पर शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के नाम पर हथियार बनाने का आरोप लगता रहा है। एनपीटी की समीक्षा हर पांच साल में होती है। आखिरी समीक्षा 2022 में हुई थी और अगली 2027 में होने की उम्मीद है।


