National News: पृथ्वी छोड़ चांद और मंगल पर बसने का सपना देख रहे इंसानों के लिए एक बड़ी चेतावनी सामने आई है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) पिछले 50 सालों से यह समझने की कोशिश कर रही है कि अंतरिक्ष में मानव शरीर पर क्या असर पड़ता है। नासा के ‘ह्यूमन रिसर्च प्रोग्राम’ की ताजा रिपोर्ट बताती है कि अंतरिक्ष में रहना उतना आसान नहीं है जितना फिल्मों में दिखता है। वहां के वातावरण में शरीर के भीतर ऐसे बदलाव होते हैं जो जानलेवा साबित हो सकते हैं।
नासा ने पहचाने अंतरिक्ष के 5 सबसे बड़े दुश्मन
नासा ने अंतरिक्ष यात्रा के दौरान होने वाले पांच प्रमुख खतरों को ‘RIDGE’ (रीज) नाम दिया है। यह एस्ट्रोनॉट्स की सेहत के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं।
- R (Radiation): स्पेस रेडिएशन, जो सबसे घातक है।
- I (Isolation): अपनों से दूर अकेलेपन का मानसिक दबाव।
- D (Distance): पृथ्वी से बढ़ती दूरी और मदद मिलने में देरी।
- G (Gravity): गुरुत्वाकर्षण के अलग-अलग फील्ड का असर।
- E (Environment): बंद और कृत्रिम वातावरण का शारीरिक प्रभाव।
सबसे खतरनाक है गैलेक्टिक कॉस्मिक रेज का कहर
अंतरिक्ष में सबसे बड़ा खतरा ‘स्पेस रेडिएशन’ है। पृथ्वी पर हमारा वायुमंडल और मैग्नेटिक फील्ड हमें हानिकारक कणों से बचाता है। लेकिन अंतरिक्ष में एस्ट्रोनॉट्स सीधे तौर पर तीन तरह के रेडिएशन झेलते हैं। इनमें सूरज से निकलने वाले कण और गैलेक्टिक कॉस्मिक रेज शामिल हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि गैलेक्टिक कॉस्मिक रेज से बचना लगभग नामुमकिन है। यह रेडिएशन धरती के मुकाबले कहीं ज्यादा शक्तिशाली और विनाशकारी होता है।
कैंसर और दिल की बीमारियों का बढ़ा खतरा
लंबे समय तक रेडिएशन के संपर्क में रहने से शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचता है। इससे कैंसर, दिल की बीमारियां और मोतियाबिंद जैसी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। नासा के आर्टेमिस मिशन के तहत चांद और मंगल पर जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स को लंबे समय तक वहां रहना होगा। ऐसे में उनके शरीर पर पड़ने वाला कुल रेडिएशन डोज बहुत ज्यादा होगा। छह महीने के स्टेशन मिशन और सालों लंबे मंगल मिशन के जोखिम बिल्कुल अलग-अलग हैं।
एस्ट्रोनॉट्स को बचाने के लिए बन रहे ‘स्पेशल सूट’
नासा अब इन खतरों से निपटने के लिए नई तकनीक पर काम कर रहा है। वैज्ञानिकों ने रेडिएशन मॉनिटरिंग के लिए नए डिटेक्टर विकसित किए हैं। ये रियल-टाइम में रेडिएशन की मात्रा और प्रकार की सटीक जानकारी देंगे। साथ ही भविष्य के मिशनों के लिए बेहतर शील्डिंग और एडवांस स्पेससूट तैयार किए जा रहे हैं। स्कॉट केली और क्रिस्टीना कोच जैसे एस्ट्रोनॉट्स के डेटा का इस्तेमाल अब आने वाले दशकों के डीप स्पेस मिशनों की तैयारी में किया जा रहा है।


