Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायत चुनावों को लेकर बहुत बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने जिलाधीशों को विशेष आरक्षण देने की शक्तियों पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी है। जिलाधीशों को भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर पांच प्रतिशत सीटें आरक्षित करनी थीं। कोर्ट ने इस फैसले को प्रथम दृष्टया संविधान के खिलाफ माना है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पुरानी शक्तियों से जारी आरक्षण रोस्टर अब पूरी तरह से रद्द माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने आरक्षण शक्तियों को बताया असंवैधानिक
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने मामले पर सुनवाई की। अदालत ने जिलाधीशों को दी गई शक्तियों को पूरी तरह से गैर-कानूनी करार दिया। न्यायाधीशों ने कहा कि संविधान में भौगोलिक आधार पर आरक्षण देने की कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए यह फैसला सीधे तौर पर संवैधानिक नियमों का घोर उल्लंघन करता है। सरकार ने अदालत को बताया कि लगभग सभी पंचायतों का आरक्षण रोस्टर पहले ही जारी हो चुका है।
सरकार के फैसले और दलीलों पर अदालत का रुख
राज्य सरकार ने चुनाव नियम बनाने की अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया था। सरकार ने इसी आधार पर जिलाधीशों को यह विशेष अधिकार दिया था। सरकार ने तीस मार्च को अधिसूचना के जरिए जिलाधीशों को पांच फीसदी सीटें आरक्षित करने की छूट दी थी। लेकिन याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि यह शक्ति पूरी तरह से असंवैधानिक है। कोर्ट ने इन दलीलों से सहमति जताई और सरकार द्वारा दी गई इन शक्तियों पर तुरंत रोक लगा दी।
नया आरक्षण रोस्टर जारी करने के दिए गए सख्त निर्देश
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद पंचायत चुनावों की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आएगा। अदालत ने प्रभावित चुनाव क्षेत्रों के लिए फिर से आरक्षण रोस्टर जारी करने का निर्देश दिया है। यह आदेश उन क्षेत्रों पर लागू होगा जहां डीसी ने पांच प्रतिशत वाली शक्ति का उपयोग किया था। कोर्ट ने सात अप्रैल शाम पांच बजे तक नया रोस्टर जारी करने का अल्टीमेटम दिया है। इससे चुनाव की तैयारियों में लगे प्रत्याशियों और राज्य प्रशासन में बहुत तेज हलचल है।
शिमला के पूर्व प्रधान ने दायर की थी जनहित याचिका
यह मामला शिमला की ठियोग तहसील के तहत आने वाली ग्राम पंचायत घोड़ना से जुड़ा है। यहां के पूर्व प्रधान विकेश जिंटा और अन्य लोगों ने इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर सरकार के फैसले को चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया कि पांच प्रतिशत सीटों पर जिलाधीशों को आरक्षण बदलने की शक्ति देना गलत है। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने यह बेहद अहम फैसला सुनाया है।
मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने किया था मामला ट्रांसफर
इससे पहले इस मामले पर मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया की खंडपीठ के सामने सुनवाई हुई। उनके साथ न्यायाधीश बीसी नेगी भी इस खंडपीठ में शामिल थे। याचिका की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने इसे दूसरी बेंच को भेजा। यह मामला उस खंडपीठ को ट्रांसफर किया गया जो सरकारी अधिसूचनाओं को असंवैधानिक ठहराने वाले मामलों को सुनती है। इसके बाद न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर की अगुवाई वाली बेंच ने इस पर रोक लगाई।
पंचायत चुनाव की तैयारियों पर पड़ेगा सीधा और बड़ा असर
हाईकोर्ट के फैसले का सीधा असर आगामी पंचायत चुनावों की तैयारियों पर पड़ने वाला है। जिन पंचायतों में भौगोलिक आधार पर आरक्षण लागू हुआ था, वहां नए सिरे से समीकरण बनेंगे। उम्मीदवारों को अब नए आरक्षण रोस्टर का बेसब्री से लंबा इंतजार करना होगा। राज्य प्रशासन के लिए सात अप्रैल तक नया रोस्टर तैयार करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी। अदालत के फैसले ने साफ कर दिया है कि चुनाव प्रक्रिया में संवैधानिक नियमों का पालन जरूरी है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता की हुई बहुत बड़ी जीत
जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह अहम कदम लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करेगा। भौगोलिक परिस्थितियों के नाम पर आरक्षण देने से कई योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन हो सकता था। अदालत ने समय रहते हस्तक्षेप करके चुनाव प्रक्रिया को बड़े विवादों से बचा लिया है। अब सभी की निगाहें सात अप्रैल को जारी होने वाले नए आरक्षण रोस्टर पर टिकी हैं। इससे पंचायत चुनाव की तस्वीर एक बार फिर से सभी के सामने बिल्कुल साफ हो जाएगी।

