India News: सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर मामले में अहम सुनवाई शुरू कर दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर चर्चा हो रही है। केंद्र सरकार ने इस गंभीर मुद्दे पर एक बड़ा लिखित जवाब दाखिल किया है। सरकार ने मंदिर में मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश पर रोक को सही बताया है।
केंद्र सरकार ने प्रवेश प्रतिबंध का किया पुरजोर समर्थन
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने अपना रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। सरकार ने अदालत से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को बरकरार रखने की अपील की है। केंद्र का स्पष्ट रूप से मानना है कि यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था से जुड़ा है। किसी भी संप्रदाय की अपनी धार्मिक स्वायत्तता होती है। इसलिए ऐसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर ही रहने चाहिए।
संविधान पीठ में शामिल हैं ये बड़े और दिग्गज न्यायाधीश
इस बेहद अहम मामले की सुनवाई के लिए नौ जजों की एक बड़ी बेंच बनाई गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत इस महत्वपूर्ण संविधान पीठ की अगुवाई कर रहे हैं। उनके साथ इस बड़ी पीठ में आठ अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश भी शामिल हैं। इनमें जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और अरविंद कुमार अहम भूमिका निभा रहे हैं। इनके अलावा जस्टिस एजी मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी पीठ का हिस्सा हैं।
साल दो हजार अठारह में कोर्ट ने सुनाया था ऐतिहासिक फैसला
सबरीमाला मंदिर मामले का कानूनी इतिहास काफी लंबा रहा है। सितंबर दो हजार अठारह में पांच जजों की बेंच ने एक बहुत बड़ा फैसला सुनाया था। उस समय अदालत ने मंदिर में दस से पचास वर्ष की महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दी थी। सदियों पुरानी इस धार्मिक प्रथा को पूरी तरह अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था। इस फैसले के बाद केरल समेत पूरे देश में भारी विरोध प्रदर्शन देखने को मिले थे।
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने मामले को भेजा था बड़ी पीठ के पास
साल दो हजार अठारह के फैसले के खिलाफ अदालत में कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गई थीं। इसके बाद नवंबर दो हजार उन्नीस में अदालत ने एक और अहम कदम उठाया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पांच सदस्यीय पीठ ने नया आदेश पारित किया। पीठ ने पूजा स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव के मुद्दे को बड़ी पीठ के पास भेज दिया। अब नौ जजों की यह पीठ महिलाओं के अधिकारों पर अपना अंतिम निर्णय देगी।

