Delhi News: आम आदमी पार्टी में एक बार फिर भारी घमासान मच गया है। पार्टी के युवा चेहरे राघव चड्ढा को राज्यसभा के उपनेता पद से हटा दिया गया है। उनकी जगह अब अशोक मित्तल को यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस बड़े फैसले के बाद राघव और राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के बीच दूरियां बढ़ने की अटकलें तेज हो गई हैं। इससे पहले भी कई बड़े नेता पार्टी नेतृत्व से नाराज होकर ‘आप’ का साथ छोड़ चुके हैं।
राघव चड्ढा को बोलने से रोकने की कोशिश
पार्टी के इस कदम ने सियासी गलियारों में बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा से केवल पद ही नहीं छीना है। पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय को एक खास पत्र भी लिखा है। इसमें अनुरोध किया गया है कि राघव को सदन में बोलने के लिए समय न दिया जाए। इस कड़े फैसले से साफ हो गया है कि पार्टी और राघव के बीच गहरे मतभेद हैं। यह विवाद पार्टी के लिए एक नई मुसीबत बन सकता है।
केजरीवाल के सबसे करीबी रहे हैं चड्ढा
राघव चड्ढा हमेशा से अरविंद केजरीवाल के बहुत करीबी माने जाते रहे हैं। वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय से ही केजरीवाल के साथ खड़े थे। पार्टी ने हमेशा उन्हें कई अहम पद सौंपे हैं। साल 2015 में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया था। पंजाब चुनाव में भी राघव ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पंजाब सरकार में भी उन्हें अहम जिम्मेदारी मिली थी। लेकिन अब अचानक दरकिनार होने से कार्यकर्ताओं में भारी बेचैनी और गुस्सा साफ दिख रहा है।
पुराने दिग्गजों ने भी छोड़ा था पार्टी का साथ
आम आदमी पार्टी में बगावत का यह पहला मामला नहीं है। कई दिग्गज नेता अरविंद केजरीवाल से अनबन के बाद पार्टी छोड़ चुके हैं। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव का नाम इसमें सबसे ऊपर आता है। कुमार विश्वास और शाजिया इल्मी भी नेतृत्व पर सवाल उठाकर अलग हो गए थे। हाल ही में कैलाश गहलोत का मामला भी सुर्खियों में रहा। इन पुराने नेताओं ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र खत्म होने का आरोप लगाया था।
विपक्षी दलों ने केजरीवाल पर साधा निशाना
राघव चड्ढा के मुद्दे पर विपक्षी दलों ने आम आदमी पार्टी पर हमला बोलना शुरू कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी ने इसे अरविंद केजरीवाल की तानाशाही बताया है। बीजेपी का कहना है कि केजरीवाल अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को तुरंत दबाना चाहते हैं। इस पूरे मामले पर राघव चड्ढा ने अभी तक खुलकर कोई बगावत नहीं की है। लेकिन राजनीति में उनकी मौजूदा खामोशी भविष्य के किसी बहुत बड़े सियासी तूफान की ओर सीधा इशारा कर रही है।


