Delhi News: अनावश्यक मुकदमों में अदालतों का समय बर्बाद करने पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। सोमवार को शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई। साथ ही सरकार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी ठोक दिया। अदालत ने एक सीआईएसएफ (CISF) अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द करने के हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। केंद्र सरकार ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अदालत ने सजा को गलत माना और अधिकारी को उसका रुका हुआ वेतन तुरंत देने का आदेश दिया।
सरकार ही सबसे बड़ी मुकदमेबाज क्यों?
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और उज्जल भुइयां की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। जस्टिस नागरत्ना ने केंद्र की अपील पर गहरी हैरानी जताई। उन्होंने पूछा कि हाई कोर्ट के सही फैसले को भी चुनौती क्यों दी गई? उन्होंने लंबित मुकदमों का हवाला देते हुए कहा कि सरकार खुद सबसे बड़ी मुकदमेबाज बन गई है। ऐसे मामलों में हर्जाना जरूर लगाया जाना चाहिए। अदालत ने साफ किया कि अगर हाई कोर्ट कोई उचित राहत देता है, तो हर मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट आने की जरूरत बिल्कुल नहीं है।
क्या था सीआईएसएफ अधिकारी का पूरा मामला?
दरअसल, सीआईएसएफ अधिकारी पर अनुशासनहीनता के दो गंभीर आरोप लगे थे। पहला आरोप 11 दिन तक बिना बताए ड्यूटी से गायब रहने का था। दूसरा आरोप एक सीआईएसएफ कांस्टेबल की बेटी के साथ मुंबई से भागने की साजिश रचने का था। कहा गया कि वह अपने छोटे भाई की शादी के लिए ऐसा कर रहा था। लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि अधिकारी उस समय स्वीकृत मेडिकल लीव पर था। इसी दौरान उसके परिवार में एक दुखद घटना भी घटी थी।
हाई कोर्ट में कैसे खुली झूठे आरोपों की पोल?
हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान सारे आरोपों की सच्चाई सामने आ गई। अदालत ने पाया कि 11 दिनों की छुट्टी पहले से ही मंजूर की गई थी। भागने के आरोप पर भी चौंकाने वाला खुलासा हुआ। कथित तौर पर जिस महिला के भागने की बात थी, वह खुद अदालत में पेश हुई। उसने साफ कहा कि उसे अधिकारी से कोई शिकायत नहीं है। यह भी साबित हो गया कि अधिकारी के भाई ने ही उस महिला से शादी की थी। इसके बाद हाई कोर्ट ने अधिकारी की बर्खास्तगी को पूरी तरह से गलत माना था।


