New Delhi News: दशकों से देश के लिए नासूर बना नक्सलवाद अब अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। पिछले दस सालों में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। पूरे देश में 10 हजार से ज्यादा माओवादियों ने अपने हथियार डाल दिए हैं। वे अब हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौट आए हैं। केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त करने का एक कड़ा लक्ष्य रखा था। सुरक्षाबलों की लगातार सख्ती और सरकार की पुनर्वास नीतियों ने इस लाल आतंक की कमर पूरी तरह तोड़ दी है।
सुरक्षाबलों का प्रहार और उग्रवादियों का आत्मसमर्पण
नक्सल प्रभावित इलाकों में अब खौफ की जगह शांति दिखाई दे रही है। सुरक्षाबलों ने पिछले कुछ सालों में बहुत ही सघन अभियान चलाए हैं। इसके कारण बचे हुए माओवादियों पर बहुत भारी दबाव बन गया है। अब तक 10 हजार से अधिक उग्रवादी पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर चुके हैं। शहरी इलाकों में सक्रिय ‘अर्बन नक्सलियों’ पर भी नकेल कसी गई है। गृह मंत्री अमित शाह ने इस पर अपना रुख साफ कर दिया है। सरकार नक्सलियों के किसी भी संघर्ष विराम प्रस्ताव को बिल्कुल नहीं मानेगी। सरकार का मुख्य लक्ष्य इस हिंसक विचारधारा को जड़ से उखाड़ फेंकना है।
आत्मसमर्पण करने वालों को मिल रहा है नया जीवन
जो हाथ कभी बंदूकें थामते थे, वे अब विकास के काम कर रहे हैं। सरकार आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को एक बेहतर जीवन दे रही है। इन लोगों को हर महीने 10 हजार रुपये का वजीफा दिया जा रहा है। इसके साथ ही उन्हें रहने के लिए घर और खेती के लिए जमीन भी मिल रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत इनके लिए 15 हजार घरों को मंजूरी मिली है। इन लोगों को अपना नया रोजगार शुरू करने के लिए विशेष व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
लाल आतंक वाले इलाकों में पहुंच रहा है विकास
जिन इलाकों में कभी गोलियों की गूंज होती थी, वहां अब विकास हो रहा है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क को बहुत तेजी से बढ़ाया गया है। इन इलाकों में 14 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी नई सड़कें बनाई गई हैं। लोगों की सुरक्षा के लिए 650 से अधिक मजबूत किलेबंद पुलिस स्टेशन बनाए गए हैं। सरकार नक्सल मुक्त गांवों में एक करोड़ रुपये के नए विकास कार्य भी करा रही है। इन सब अथक प्रयासों से नक्सली हिंसा में 89 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई है।


