New Delhi News: विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मंच पर भारत ने करोड़ों मछुआरों के हक में एक बड़ी कूटनीतिक जंग छेड़ दी है। कैमरून के याउंडे में आयोजित 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में भारत ने मछली पालन सब्सिडी को लेकर अपना रुख साफ कर दिया है। वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारतीय दल ने विकसित देशों को आईना दिखाते हुए 25 साल की छूट की मांग रखी है। भारत का कहना है कि औद्योगिक रूप से मछली पकड़ने वाले बड़े देशों और पारंपरिक मछुआरों के बीच फर्क करना होगा। यह लड़ाई सिर्फ व्यापार की नहीं, बल्कि भारत के 90 लाख मछुआरा परिवारों की खाद्य सुरक्षा और उनकी आजीविका को बचाने की है।
गहरे समंदर के ‘शिकारियों’ पर नकेल की तैयारी
भारत ने डब्ल्यूटीओ में गहरे पानी में मछली पकड़ने वाले औद्योगिक बेड़ों पर कड़े नियम लागू करने की वकालत की है। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, भारत ने मछली पालन सब्सिडी समझौते के दूसरे चरण में पारंपरिक मछुआरों के लिए स्थायी छूट मांगी है। पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि भारत कोई बड़ा औद्योगिक मछली पकड़ने वाला देश नहीं है। हमारे पास भारी मशीनें या विशाल बेड़े नहीं हैं। भारत की मांग है कि सब्सिडी के नियम निष्पक्ष होने चाहिए ताकि कमजोर देशों के छोटे मछुआरों पर इसका कोई बुरा असर न पड़े।
90 लाख परिवारों की खाद्य सुरक्षा का सवाल
पीयूष गोयल ने दुनिया के सामने भारत की जमीनी हकीकत को मजबूती से रखा है। उन्होंने कहा कि मछली पालन क्षेत्र भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाता है। देश में 90 लाख से ज्यादा मछुआरे परिवार इस व्यवसाय पर निर्भर हैं। इनमें से ज्यादातर छोटे और पारंपरिक तरीके से काम करने वाले लोग हैं। भारत ने तर्क दिया है कि विकसित देशों को उन औद्योगिक बेड़ों को रोकना चाहिए जो समंदर के संसाधनों का बेतहाशा दोहन कर रहे हैं। भारत के लिए यह मुद्दा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा है।
दुनिया में सबसे कम सब्सिडी देता है भारत
मछली पालन सब्सिडी के आंकड़ों ने डब्ल्यूटीओ में कई देशों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। भारत की ओर से पेश आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय मछुआरों को मिलने वाली सब्सिडी दुनिया में सबसे कम है। भारत हर साल प्रति मछुआरा परिवार औसतन केवल 15 डॉलर (लगभग 1250 रुपये) की मदद देता है। इसके विपरीत, कई अमीर देश अपने औद्योगिक मत्स्य पालन को अरबों डॉलर की सब्सिडी देते हैं। भारत ने मांग की है कि दूसरे चरण की बातचीत में समानता के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन होना चाहिए।
पीयूष गोयल ने बनाया भविष्य का मार्ग
कैमरून में 26 से 29 मार्च तक चली इस बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई है। पीयूष गोयल ने दूसरे चरण की बातचीत के भविष्य को निर्धारित करने वाले फैसलों में भारत की भूमिका को अग्रणी रखा। मंत्रालय का कहना है कि भारत ने डब्ल्यूटीओ के मंच से जोरदार तरीके से अपनी बात रखी है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर हैं कि क्या डब्ल्यूटीओ भारत की इन उचित मांगों को स्वीकार करेगा। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने मछुआरों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।


