Tamil Nadu News: तमिलनाडु के चुनावी रण में इस बार एक ऐसी तस्वीर उभरी है जिसने पूरे देश के राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। राज्य की सत्ता के मुख्य दावेदार डीएमके और एआईएडीएमके सहित कांग्रेस और भाजपा ने भी इस चुनाव में एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। यह फैसला महज एक संयोग नहीं, बल्कि उस सदी पुराने द्रविड़ आंदोलन की जीत है जिसने राज्य की सामाजिक और राजनीतिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया है।
सौ साल पुराने गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र का असर
तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय की चुनावी अनुपस्थिति को समझने के लिए हमें 1916 के इतिहास में जाना होगा। उस दौर में जारी ‘गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र’ ने राज्य में एक नई चेतना को जन्म दिया था। तब ब्राह्मणों की जनसंख्या भले ही कम थी, लेकिन शिक्षा और सरकारी नौकरियों में उनका वर्चस्व बहुत अधिक था। इसी असंतुलन ने गैर-ब्राह्मणों के भीतर एक बड़े असंतोष को जन्म दिया, जो बाद में एक मजबूत राजनीतिक आंदोलन बन गया।
द्रविड़ आंदोलन और ब्राह्मणवाद का विरोध
पेरियार ई.वी. रामास्वामी के नेतृत्व में चले द्रविड़ आंदोलन ने ब्राह्मण विरोधी विचारधारा को राज्य की राजनीति का केंद्र बना दिया। यह केवल एक जाति विशेष का विरोध नहीं था, बल्कि एक वैकल्पिक सत्ता संरचना का निर्माण था। इस आंदोलन ने पिछड़ी जातियों को एकजुट किया और उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी का अहसास कराया। धीरे-धीरे ब्राह्मण समुदाय को सत्ता के प्रतीकों से बाहर कर दिया गया और राजनीति केवल पिछड़ी जातियों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई।
1954: जब पहली बार सत्ता से बाहर हुए ब्राह्मण
तमिलनाडु में सत्ता का हस्तांतरण 1950 के दशक में ही शुरू हो चुका था। 1954 में जब के. कामराज के नेतृत्व में सरकार बनी, तब पहली बार मद्रास राज्य के मंत्रिमंडल में एक भी ब्राह्मण मंत्री शामिल नहीं था। यह उस बड़े बदलाव की शुरुआत थी जिसने भविष्य की राजनीति तय कर दी। इसके बाद से ही कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों का नेतृत्व भी ब्राह्मणों के हाथों से निकलकर गैर-ब्राह्मण नेताओं के पास चला गया।
भाजपा की चुनावी रणनीति और जोखिम
सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात भाजपा का रुख है, जिसे अक्सर ब्राह्मणों और उच्च जातियों की समर्थक पार्टी माना जाता है। भाजपा ने भी तमिलनाडु में किसी ब्राह्मण को उम्मीदवार नहीं बनाकर यह साफ कर दिया है कि वह राज्य के द्रविड़ गौरव और जातीय समीकरणों से टकराने का जोखिम नहीं लेना चाहती। पार्टी को पता है कि तमिलनाडु की जमीन पर चुनाव जीतने के लिए पिछड़ी जातियों का समर्थन हासिल करना अनिवार्य है।
जयललिता का अपवाद और मौजूदा स्थिति
जे. जयललिता तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा अपवाद रही हैं। उन्होंने ब्राह्मण होते हुए भी द्रविड़ राजनीति के सबसे बड़े चेहरे के रूप में खुद को स्थापित किया। हालांकि, उन्होंने कभी भी अपनी जातीय पहचान को आगे नहीं रखा और न ही ब्राह्मणों को सत्ता के केंद्र में वापस लाने की कोशिश की। उनके जाने के बाद अब एआईएडीएमके में भी थेवर और गौंडर जैसे प्रभावशाली समुदायों का पूरी तरह से कब्जा हो चुका है।
क्या पर्दे के पीछे से चल रहा है खेल?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ब्राह्मण समुदाय अब चुनावी जोखिम लेने के बजाय सिस्टम का हिस्सा बने रहने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है। आज भी राज्य की नौकरशाही, न्यायपालिका, मीडिया और नीति निर्माण में इस समुदाय का अच्छा-खासा प्रभाव बना हुआ है। यानी चुनावी मैदान में चेहरा भले ही न हो, लेकिन व्यवस्था के भीतर उनकी मौजूदगी अभी भी काफी प्रभावी है। वे अब चेहरा बनने के बजाय सिस्टम की दिशा तय कर रहे हैं।
सत्ता के नए समीकरण और बदलती हकीकत
मौजूदा दौर में तमिलनाडु की राजनीति अब ब्राह्मण बनाम गैर-ब्राह्मण की नहीं रह गई है। अब मुकाबला पिछड़ी जातियों और प्रभावशाली समुदायों के बीच वर्चस्व की लड़ाई बन चुका है। डीएमके और एआईएडीएमके दोनों ही दल अब अपने-अपने जातीय आधार को मजबूत करने में जुटे हैं। इस बदली हुई हकीकत में ब्राह्मण उम्मीदवारों की गैर-मौजूदगी अब कोई खबर नहीं, बल्कि राज्य की एक स्थाई राजनीतिक सच्चाई बनकर सामने आई है।
तमिलनाडु की राजनीति का यह अनूठा मोड़ पूरे देश के लिए एक अध्ययन का विषय है। यह दिखाता है कि कैसे एक सामाजिक आंदोलन दशकों तक राजनीतिक दिशा को प्रभावित कर सकता है। जहां चेहरे बदलते हैं, मुद्दे बदलते हैं, लेकिन सत्ता की मूल परिभाषा वही रहती है जो जनता की जमीन से जुड़ी हो। ब्राह्मणों का चुनावी मैदान से हटना इस बात का प्रमाण है कि यहां राजनीति अब प्रतीकों से नहीं चलती।

