India News: मशहूर स्टैंडअप कॉमेडियन और यूट्यूबर समय रैना ने कश्मीर घाटी से अपने परिवार के उजड़ने का दर्दनाक किस्सा साझा किया है। रैना ने बताया कि कैसे आतंकवाद के दौर में उनके घर पर गोलियां चलीं और उसे आग के हवाले कर दिया गया। 1990 के दशक में हुए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन ने लाखों परिवारों को शरणार्थी बना दिया था। समय के मुताबिक, पंडित समुदाय केवल पांच प्रतिशत था, जो मुकाबला करने की स्थिति में नहीं था। आज यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।
घाटी में दहशत का वो दौर और पंडितों का नरसंहार
कश्मीर घाटी में 1980 के दशक के अंत में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने जड़ें जमा ली थीं। आतंकियों ने चुन-चुनकर हिंदू नेताओं और बुद्धिजीवियों की हत्याएं शुरू कर दीं। 14 सितंबर 1989 को बीजेपी नेता टीका लाल टपलू की सरेआम हत्या ने खौफ पैदा कर दिया। इसके बाद नवंबर में रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू को निशाना बनाया गया। इन हत्याओं का एकमात्र उद्देश्य कश्मीरी पंडितों के मन में गहरा डर पैदा करना और उन्हें घाटी छोड़ने पर मजबूर करना था।
19 जनवरी 1990 की वो काली रात और खौफनाक नारे
कश्मीरी पंडितों के लिए 19 जनवरी 1990 का दिन ‘विस्थापन दिवस’ के रूप में दर्ज है। उस रात मस्जिदों से लाउडस्पीकरों के जरिए ‘रालिब, गालिब, चालिब’ के नारे गूंज रहे थे। इसका सीधा अर्थ था- या तो इस्लाम अपनाओ, या मर जाओ, या घाटी छोड़ दो। दीवारों पर धमकियों भरे पोस्टर चिपका दिए गए थे। खौफ इतना भयावह था कि सदियों से रह रहे परिवार रातों-रात अपनी संपत्ति छोड़कर जम्मू और दिल्ली की ओर भागने को मजबूर हो गए।
गिरिजा टिक्कू और सरला भट्ट: मानवता को शर्मसार करने वाले कांड
आतंकवाद के उस खूनी दौर में महिलाओं के साथ दरिंदगी की सीमाएं पार कर दी गईं। जून 1990 में बारामूला की गिरिजा टिक्कू को अगवा कर यातनाएं दी गईं और फिर जिंदा आरी से काट दिया गया। इसी तरह अप्रैल 1990 में नर्स सरला भट्ट के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ और उनकी हत्या कर दी गई। इन घटनाओं ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। इन नृशंस हत्याओं ने कश्मीरी हिंदू समुदाय के भीतर सुरक्षा की रही-सही उम्मीद भी पूरी तरह खत्म कर दी।
संग्रामपुरा से नादिमर्ग तक सामूहिक हत्याओं का सिलसिला
घाटी में केवल व्यक्तिगत हत्याएं नहीं हुईं, बल्कि बड़े पैमाने पर सामूहिक नरसंहार भी किए गए। 1997 के संग्रामपुरा नरसंहार में 8 पंडितों को लाइन में खड़ा करके गोलियां मारी गईं। 1998 में वंधामा कस्बे में बच्चों और महिलाओं सहित 23 हिंदुओं का कत्ल कर दिया गया। 2003 के नादिमर्ग नरसंहार में 24 लोगों की हत्या की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा ने ली थी। इन खूनी वारदातों ने पंडितों की घर वापसी के हर संभव रास्ते को लगभग बंद कर दिया था।
शरणार्थी शिविरों की बदहाली और आज के हालात
घाटी से उजड़कर आए पंडितों ने जम्मू और दिल्ली के बदहाल टेंटों में शरण ली। आलीशान कोठियों के मालिक भीषण गर्मी, सांप के काटने और बीमारियों से दम तोड़ने लगे। अनुच्छेद 370 हटने के बाद सरकार ने पुनर्वास के प्रयास तेज किए हैं। मंदिर संरक्षण विधेयक और नए सुरक्षा ढांचे पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अनुसार, सुरक्षा और सामाजिक विश्वास की कमी के कारण अब भी पूर्ण वापसी एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है।

