India News: भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आज एक ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया है। तमिलनाडु के कलपक्कम में मौजूद प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने अपनी क्रिटिकलिटी हासिल कर ली है। महान वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने दशकों पहले यह सपना देखा था। इस सफलता के साथ भारत ने बिजली उत्पादन की दिशा में नया अध्याय शुरू किया है। यह भारत के थ्री-स्टेज परमाणु कार्यक्रम के दूसरे अहम चरण की एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक जीत है।
रूस के बाद दुनिया में भारत का डंका
यह अत्याधुनिक रिएक्टर पूरी तरह भारत में बना है। भारतीय वैज्ञानिकों ने दशकों की कड़ी मेहनत से इसे तैयार किया है। इस उपलब्धि के बाद भारत दुनिया का दूसरा देश बन गया है। अब भारत के पास व्यावसायिक स्तर पर ऑपरेशनल फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है। इससे पहले केवल रूस ने यह कारनामा किया था। अमेरिका, फ्रांस और जापान जैसे देश अभी इस तकनीक पर काम कर रहे हैं। भारत ने इस मामले में विकसित देशों को पीछे छोड़ दिया है।
आखिर क्या है क्रिटिकलिटी और इसकी अहमियत?
परमाणु विज्ञान में क्रिटिकलिटी का अर्थ एक स्थिर प्रक्रिया से होता है। इसका सीधा मतलब है कि रिएक्टर के अंदर न्यूक्लियर फिशन की प्रक्रिया नियंत्रित हो गई है। यह रिएक्टर अब बिजली पैदा करने के लिए बिल्कुल तैयार है। किसी भी परमाणु प्लांट के लिए यह सबसे अहम पड़ाव होता है। इस परीक्षण से स्पष्ट है कि भारतीय तकनीक हर पैमाने पर खरी उतरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वैज्ञानिकों को इस महान सफलता पर दिल से बधाई दी है।
खर्च से ज्यादा नया ईंधन बनाता है यह रिएक्टर
दुनिया के ज्यादातर प्लांट सामान्य थर्मल रिएक्टर होते हैं। कलपक्कम का यह पांच सौ मेगावाट का पीएफबीआर एक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर है। यह यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड ईंधन का उपयोग करता है। इसके चारों तरफ यूरेनियम-238 की परत होती है। जब रिएक्टर चलता है तो न्यूट्रॉन बेकार यूरेनियम को प्लूटोनियम में बदल देते हैं। यह रिएक्टर जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे अधिक नया ईंधन बनाता है। इस प्लूटोनियम को आसानी से दोबारा ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
तरल सोडियम का इस्तेमाल और कचरे से मुक्ति
साधारण परमाणु रिएक्टरों में बहुत अधिक गर्मी पैदा होती है। इसे कम करने के लिए आमतौर पर पानी का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इस एडवांस फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में लिक्विड सोडियम का इस्तेमाल होता है। सोडियम पानी की तुलना में गर्मी को बहुत तेजी से सोख लेता है। इससे रिएक्टर की कार्यक्षमता कई गुना तक बढ़ जाती है। इस नई टेक्नोलॉजी का एक सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे परमाणु कचरे और भारी प्रदूषण की समस्या बहुत कम हो जाती है।
थोरियम का बड़ा भंडार और ऊर्जा सुरक्षा का विजन
भारत के पास पूरी दुनिया के थोरियम भंडार का पच्चीस प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। थोरियम को सीधे तौर पर ईंधन नहीं बनाया जा सकता है। इसे ईंधन बनाने के लिए फास्ट न्यूट्रॉन से रिएक्शन कराना जरूरी होता है। कलपक्कम जैसे फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ही यह प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। यह महान सफलता भारत को ऊर्जा के मामले में अगले चार सौ सालों तक आत्मनिर्भर बना देगी। हमें भविष्य में किसी भी दूसरे देश से यूरेनियम मांगने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।
सस्ती बिजली और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने में मदद
इस नई तकनीक के शुरू होने से आम जनता को सीधा फायदा मिलेगा। आने वाले समय में देश के लोगों को बड़े पैमाने पर सस्ती बिजली प्राप्त होगी। देश को तेल और कोयले के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इस रिएक्टर की सबसे बड़ी खासियत इसका पर्यावरण के अनुकूल होना है। इस पावर प्लांट से कार्बन उत्सर्जन बिल्कुल नहीं होता है। यह साफ और ग्रीन ऊर्जा ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौती से लड़ने में भारत की बड़ी मदद करेगी।
पड़ोसी देशों की बढ़ी चिंता और भारत का शांतिपूर्ण रुख
कलपक्कम प्लांट की इस सफलता का असर वैश्विक राजनीति पर भी पड़ेगा। इस तकनीक ने चीन और पाकिस्तान जैसे देशों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार फास्ट ब्रीडर रिएक्टर से उच्च गुणवत्ता वाला प्लूटोनियम निकलता है। इसका उपयोग परमाणु हथियारों की क्षमता को अधिक आधुनिक बनाने में किया जा सकता है। हालांकि भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना रुख स्पष्ट रखा है। भारत इस तकनीक का उपयोग केवल शांतिपूर्ण कार्यों और देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए करेगा।


