Himachal News: हिमाचल प्रदेश ने टीबी मुक्त होने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर पार किया है। राज्य की कुल 3613 पंचायतों में से 1052 को आधिकारिक तौर पर टीबी मुक्त घोषित किया गया है। यह पहली बार है जब प्रदेश में टीबी मुक्त पंचायतों का आंकड़ा एक हजार के पार पहुंचा है। स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार के साझा प्रयासों से यह उपलब्धि हासिल हुई है। हालांकि, आंकड़ों की बाजीगरी के बीच अभी भी 69 प्रतिशत काम होना बाकी है। आयुष्मान आरोग्य शिविर और निक्षय वाहनों के जरिए गांव-गांव तक इलाज पहुंचाने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं।
ऊना और कांगड़ा का जलवा, लाहुल-स्पीति ने भी मारी बाजी
जमीनी स्तर पर देखें तो जिला ऊना ने सबसे शानदार प्रदर्शन किया है। ऊना की 64 प्रतिशत यानी 245 में से 158 पंचायतें टीबी मुक्त हो चुकी हैं। दुर्गम जिला लाहुल-स्पीति भी पीछे नहीं है, जहाँ 60 फीसदी पंचायतों ने इस बीमारी को मात दी है। संख्या के लिहाज से कांगड़ा सबसे आगे है। यहाँ की 814 पंचायतों में से 287 अब टीबी से पूरी तरह मुक्त हैं। इन जिलों की सफलता स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतर पहुंच और सक्रियता का प्रमाण है।
मंडी और कुल्लू की सुस्ती ने बढ़ाई प्रशासन की सिरदर्दी
सफलता की इस कहानी के बीच कुछ जिलों की हालत काफी चिंताजनक बनी हुई है। मंडी जिला इस सूची में सबसे निचले पायदान पर है। यहाँ की 557 पंचायतों में से मात्र 77 ही टीबी मुक्त हो पाई हैं, जो केवल 14 प्रतिशत है। कुल्लू की स्थिति भी दयनीय है, जहाँ सिर्फ 15 प्रतिशत पंचायतों ने लक्ष्य हासिल किया है। सिरमौर और सोलन की रफ्तार भी बेहद धीमी है। इन जिलों में टीबी उन्मूलन अभियान को नई ऊर्जा देने की सख्त जरूरत है।
निक्षय वाहन और आयुष्मान शिविर बन रहे मददगार
सीएमओ कांगड़ा डॉ. विवेक करोल ने बताया कि वर्तमान वर्ष में टीबी मुक्त ग्राम पंचायत पहल को विशेष गति मिली है। आयुष्मान आरोग्य शिविरों के माध्यम से दूरदराज के इलाकों में मरीजों की पहचान की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग विभिन्न संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रहा है। सरकार का लक्ष्य प्रदेश की हर पंचायत को इस घातक बीमारी से आजाद करना है। फिलहाल 29 फीसदी सफलता उत्साहजनक है, लेकिन शेष 71 फीसदी पंचायतों तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती है।


