बाबू जगजीवन राम: वो दलित नेता जो दो बार बनते-बनते रह गए देश के प्रधानमंत्री, जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी

India News: भारतीय राजनीति के इतिहास में कई रोचक किस्से हमेशा के लिए दर्ज हैं। बाबू जगजीवन राम का नाम इन्हीं में प्रमुखता से शामिल है। वे आसानी से देश के पहले दलित प्रधानमंत्री बन सकते थे। उन्हें दो बार यह शानदार मौका मिला था। लेकिन ऐन वक्त पर सियासी दांव-पेच ने उनका खेल पूरी तरह बिगाड़ दिया। वे नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी की कैबिनेट तक ताकतवर मंत्री रहे। सियासत में उन्होंने हमेशा अहम भूमिका निभाई। आइए उनके इन दिलचस्प किस्सों को विस्तार से जानें।

दलितों के अधिकारों के लिए शुरुआती संघर्ष

बाबू जगजीवन राम ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से विज्ञान विषय लेकर अपनी इंटर की परीक्षा पास की थी। इसके बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की। साल 1931 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्होंने 1934-35 के दौरान दलितों को समाज में समानता का अधिकार दिलाने के लिए अखिल शोषित वर्ग लीग की स्थापना की। इसके बाद 1940 और 1942 के स्वतंत्रता आंदोलनों में भी उन्होंने काफी बढ़-चढ़कर अपनी सक्रिय हिस्सेदारी दर्ज कराई थी।

कैबिनेट मंत्री के तौर पर लंबा और शानदार रिकॉर्ड

महज 28 साल की उम्र में जगजीवन राम 1936 में बिहार विधान परिषद सदस्य नामित हुए। 1937 की बिहार सरकार में उन्हें शिक्षा और विकास मंत्रालय में संसदीय सचिव नियुक्त किया गया। स्वतंत्रता के बाद 1952 से 1979 तक वे लगातार केंद्रीय कैबिनेट में महत्वपूर्ण मंत्री पद पर विराजमान रहे। देश के राजनीतिक इतिहास में यह एक शानदार रिकॉर्ड है। किसी दलित राजनेता ने इतने लंबे समय तक शक्तिशाली पदों पर काम नहीं किया था।

आपातकाल के दौरान कांग्रेस से मोहभंग

आपातकाल के समय कई विपक्षी नेता जेल में बंद थे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जेल से बाहर आ चुके थे। अचानक एक दिन हेमवती नंदन बहुगुणा ने चंद्रशेखर से गुपचुप मुलाकात की। उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ने और नया राजनीतिक दल बनाने का स्पष्ट संकेत दिया। चंद्रशेखर ने इस विचार को बहुत बढ़िया बताया। उस समय दलित वोट बैंक को कांग्रेस के पक्ष में रखने का श्रेय जगजीवन राम को ही जाता था। बहुगुणा ने उनसे संपर्क साधना शुरू किया।

चंद्रशेखर और जगजीवन राम की गुप्त मुलाकात

इमरजेंसी के दौरान जगजीवन राम सरकार में अहम पद पर थे। लेकिन संजय गांधी की कार्यशैली से उनका मन खट्टा हो चुका था। जनवरी की एक ठिठुरती रात को दोनों नेताओं ने गुप्त बातचीत की। चंद्रशेखर और जगजीवन राम चादर ओढ़कर रिक्शे पर छिपते हुए एक बंगले पर पहुंचे। वहां उन्होंने चंद्रशेखर का हाथ पकड़कर कांग्रेस छोड़ने का पक्का फैसला सुनाया। उन्होंने इस मुश्किल समय में विपक्ष का पूरा साथ देने का मजबूत वादा किया।

नई पार्टी का गठन और जनता का भरपूर समर्थन

चुनावों की घोषणा के बाद राजनीति में बड़ा धमाका हुआ। दो फरवरी को जगजीवन राम और बहुगुणा ने कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बनाई। इसका नाम ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ रखा गया। जल्द ही यह दल जनता पार्टी में मिल गया। जगजीवन राम कांग्रेस के सबसे बड़े दलित चेहरे थे। उनके ऐतिहासिक फैसले ने उत्तर भारत के दलित समाज में हलचल मचा दी। वे जनता पार्टी के प्रचार में सबसे ज्यादा भीड़ खींचने वाले बड़े नेता बनकर उभरे।

पहली बार जब छूटी प्रधानमंत्री की कुर्सी

साल 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को शानदार बहुमत मिला। सरकार में प्रधानमंत्री पद के लिए तीन बड़े दावेदार सामने आए। इनमें मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह प्रमुख थे। जनसंघ के सदस्य एक दलित नेता को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहते थे। उन्होंने जगजीवन राम को अपना भारी समर्थन भी दिया। लेकिन अस्पताल में भर्ती चौधरी चरण सिंह ने ऐन वक्त पर बड़ा राजनीतिक खेल कर दिया। उन्होंने अपनी गुप्त चाल से पांसा पूरी तरह पलट दिया।

चरण सिंह की चाल और मोरारजी बने प्रधानमंत्री

चौधरी चरण सिंह खुद को प्रधानमंत्री पद की रेस में पिछड़ता देख रहे थे। वे किसी कीमत पर जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनते नहीं देखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अस्पताल से ही मोरारजी देसाई को समर्थन देने की चिट्ठी लिख दी। इस छोटी सी चिट्ठी ने जगजीवन राम को प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर कर दिया। अंततः मोरारजी देसाई ने देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। वहीं जगजीवन राम उपप्रधानमंत्री के तौर पर सरकार में शामिल होने को मजबूर हुए।

दूसरी बार जब राष्ट्रपति रेड्डी बने सबसे बड़ा रोड़ा

जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई। इसके बाद चरण सिंह प्रधानमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार भी जल्द गिर गई। अब जगजीवन राम का रास्ता फिर से साफ नजर आ रहा था। उनके पास जनता पार्टी के 205 सांसदों का मजबूत समर्थन हासिल था। वे इस सूची के साथ तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी से मिले। उन्होंने जल्द ही पूर्ण बहुमत जुटाने का दावा किया। लेकिन राष्ट्रपति रेड्डी ने उनके इस दावे को नजरअंदाज कर दिया।

संसद भंग हुई और टूट गया सबसे बड़ा सपना

राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी की सोच कुछ और ही थी। अगले ही दिन उन्होंने अचानक संसद भंग करने की बड़ी घोषणा कर दी। राष्ट्रपति के इस विवादित फैसले के खिलाफ देश में काफी हंगामा भी हुआ। लेकिन तब तक सब कुछ निरर्थक हो चुका था। इस तरह दूसरी बार भी देश के सर्वोच्च पद की कुर्सी जगजीवन राम की पहुंच से बाहर रही। अगर ऐसा नहीं होता, तो भारत को अपना पहला दलित प्रधानमंत्री उसी वक्त मिल जाता।

दोहरी सदस्यता के विवाद और कांग्रेस वापसी

साल 1980 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद जनता पार्टी में भयंकर कलह शुरू हो गई। इस दौरान दोहरी सदस्यता का विवाद एक बार फिर से गरमा गया। जनसंघ के सदस्यों को जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में से किसी एक को चुनने का साफ निर्देश दिया गया। अध्यक्ष चंद्रशेखर और मोरारजी देसाई की एकता की सभी कोशिशें पूरी तरह नाकाम रहीं। इसके बाद निराश होकर जगजीवन राम भी वाई. बी. चव्हाण की अगुवाई वाली कांग्रेस (यू) में शामिल हो गए।

लंबे सियासी सफर का अंतिम पड़ाव और निधन

विभाजित जनता पार्टी ने 1980 का चुनाव बाबू जगजीवन राम के नाम पर लड़ा। लेकिन पार्टी को करारी हार झेलनी पड़ी। उनका जन्म 5 अप्रैल 1908 को बिहार के भोजपुर में हुआ था। उन्होंने आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। साल 1952 से 1980 तक वे लगातार लोकसभा चुनाव जीतते रहे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 की सहानुभूति लहर में उन्हें पहली हार का सामना करना पड़ा। 6 जुलाई 1986 को इस महान नेता का निधन हो गया।

SOURCE: न्यूज एजेंसी
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