Himachal News: हिमाचल हाई कोर्ट ने एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने शिक्षा विभाग को सख्त निर्देश दिए हैं। अब सेवानिवृत्त चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पार्टटाइम कार्यकाल को पेंशन के लिए गिना जाएगा। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने इस अहम याचिका को स्वीकार किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दस साल तक पार्टटाइम जलवाहक रहने वाला कर्मचारी नियमितीकरण का हकदार है। यह फैसला कई कर्मचारियों के लिए बड़ी उम्मीद है।
पेंशन के लिए गिना जाएगा पार्टटाइम कार्यकाल
हाई कोर्ट ने शिक्षा विभाग को स्पष्ट आदेश जारी किए हैं। विभाग को याचिकाकर्ता कुलदीप सिंह को नोशनल नियमितीकरण देना होगा। यह लाभ उस तारीख से मिलेगा जब उन्होंने दस साल की पार्टटाइम सेवा पूरी की थी। इस अवधि के लिए कोई नकद लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन यह समय पेंशन पात्रता के लिए जरूर गिना जाएगा। अदालत ने सेवानिवृत्ति की तारीख से पेंशन शुरू करने का आदेश दिया है। विभाग को तीन महीने में बकाया चुकाना होगा।
बकाया नहीं चुकाने पर लगेगा भारी ब्याज
अदालत ने बकाया राशि चुकाने के लिए समय सीमा तय कर दी है। विभाग को तीन महीने के अंदर पूरा पैसा देना होगा। अगर सरकार ऐसा करने में विफल रहती है, तो उसे जुर्माना भरना पड़ेगा। विभाग को निर्णय की तारीख से छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। याचिकाकर्ता को पहली बार 14 जनवरी 1999 को नौकरी मिली थी। प्रशासन की सिफारिश पर उन्हें पार्टटाइम जलवाहक बनाया गया था। अगस्त 2012 में वे पूर्णकालिक कर्मचारी बने।
दस साल की सेवा नहीं होने पर रुकी थी पेंशन
कुलदीप सिंह को सितंबर 2012 में नियमित आधार पर पदोन्नत किया गया। उन्हें चतुर्थ श्रेणी में चपरासी सह चौकीदार का पद मिला। वह जनवरी 2022 को इसी पद से सेवानिवृत्त हुए। रिटायरमेंट तक उनकी कुल नियमित सेवा नौ साल, चार महीने और 16 दिन थी। पेंशन के लिए न्यूनतम दस साल की नियमित सेवा अनिवार्य होती है। समय कम होने के कारण सरकार ने उन्हें पेंशन देने से साफ इनकार कर दिया था। फिर मामला कोर्ट पहुंचा।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को माना सही
अदालत में सुनवाई के दौरान प्रार्थी ने अपनी मजबूत दलीलें पेश कीं। उन्होंने बताया कि 1999 से 2012 तक उन्होंने पार्टटाइम जलवाहक के रूप में काम किया। कागजों में उनका पद पार्टटाइम वाटर कैरियर दर्ज था। लेकिन असलियत में वह स्कूल के पूरे समय अपनी ड्यूटी निभाते थे। वह काम के दौरान पूरे समय मौजूद रहते थे। हाई कोर्ट ने इन सभी तथ्यों और दलीलों से अपनी पूरी सहमति जताई। इसके बाद जज ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया।

