Himachal News: हाईकोर्ट ने शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े दो अहम फैसले दिए हैं। मंडी की पटेल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे बीएड छात्रों को अदालत ने बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्र अपनी इच्छा से संस्थान चुन सकते हैं। वहीं, नेरचौक मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर की नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई है। अदालत के इन अहम फैसलों से राज्य के सैकड़ों छात्रों और नियमित डॉक्टरों का भविष्य सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
बीएड छात्रों को हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने छात्रों के हित में आदेश जारी किया है। पटेल यूनिवर्सिटी के बीएड छात्र अब अपनी मर्जी से परीक्षा केंद्र चुन सकते हैं। अदालत ने कहा कि जो छात्र पुराने संस्थान में पढ़ना चाहते हैं, वे वहां रुक सकते हैं। एक अप्रैल 2026 की अधिसूचना के तहत नए कॉलेज चुनने वाले वहां जा सकते हैं। छात्रों पर कोई दबाव नहीं होगा। अगली सुनवाई अट्ठाईस मई को होगी।
मान्यता रद्द होने के मामले में कानूनी स्पष्टीकरण
परिषद ने दो फरवरी 2026 को इस बीएड संस्थान की मान्यता रद्द की थी। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने भी संबद्धता खत्म कर दी। सरकार ने छात्रों को अन्य कॉलेजों में शिफ्ट करने का आदेश दिया। इसके खिलाफ इक्यानवे छात्रों ने हाईकोर्ट में अपील की। छात्रों के वकील ने स्पष्ट किया कि मान्यता रद्द होने का असर वर्तमान सत्र के बीच में लागू नहीं हो सकता। अदालत ने माना कि यह नियम केवल अगले शैक्षणिक सत्र से ही पूरी तरह से प्रभावी माना जाता है।
मेडिकल कॉलेज में एनेस्थीसिया प्रोफेसर की भर्ती रुकी
हाईकोर्ट ने मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों की कमी दूर करने की सरकारी नीति वाली याचिका पर सुनवाई की। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने इसका कड़ा संज्ञान लिया। अदालत ने नेरचौक स्थित लाल बहादुर शास्त्री मेडिकल कॉलेज में एनेस्थीसिया प्रोफेसर की नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने प्रशासन को सख्त आदेश दिया है कि अगले फैसले तक कोई नियुक्ति न हो। इस अहम मामले की अगली सुनवाई इक्कीस अप्रैल को तय की गई है।
नए विज्ञापन और याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि मुवक्किल अगले चौंतीस दिनों में प्रोफेसर पद के लिए पात्र हो जाएंगी। विभाग ने छह अप्रैल को नया विज्ञापन जारी किया है। यह विज्ञापन मौजूदा पदोन्नति नियमों के बिल्कुल खिलाफ है। नए विज्ञापन से पात्र होने के बावजूद उनके पास प्रोफेसर बनने का कोई विकल्प नहीं बचेगा। उनका एक अभ्यावेदन सरकार के पास पहले से लंबित है। कोर्ट ने सरकार को इस पर जल्द तर्कसंगत आदेश पारित करने का स्पष्ट निर्देश दिया है।
सेवानिवृत्त प्रोफेसरों की नियुक्ति नीति पर उठे सवाल
सरकार डॉक्टरों की कमी दूर करने के लिए सेवानिवृत्त प्रोफेसरों को नियुक्त कर रही है। इन प्रोफेसरों को ढाई लाख रुपये का भारी मानदेय दिया जा रहा है। नाहन, नेरचौक, हमीरपुर और चंबा में यह प्रक्रिया जारी है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस नीति से नियमित डॉक्टरों को भारी नुकसान होगा। जो नियमित डॉक्टर पदोन्नति के हकदार हैं, वे अब इस अवसर से वंचित रह जाएंगे। अदालत इस मामले पर बहुत गंभीरता से विचार कर रही है।


