Uttar Pradesh News: नोएडा के किसानों का 44 साल लंबा इंतज़ार अब आखिरकार खत्म हो गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए किसानों की जमीन का मुआवजा साढ़े चार गुना से भी ज्यादा बढ़ा दिया है। 1976 में अधिग्रहित की गई इस जमीन का मुआवजा अब 6 रुपये से बढ़ाकर 28.12 रुपये प्रति वर्ग गज कर दिया गया है। यह फैसला दादरी तहसील के मोरना गांव के किसानों के लिए एक बहुत बड़ी जीत लेकर आया है। न्याय की यह लड़ाई कई दशकों तक अदालती फाइलों में चलती रही, लेकिन अंततः अदालत ने किसानों के हक में अपनी मुहर लगा दी है।
दशकों पुरानी है यह कानूनी लड़ाई
यह पूरा विवाद साल 1976 से जुड़ा हुआ है। उस वक्त मोरना गांव गाजियाबाद जिले का हिस्सा हुआ करता था। सरकार ने तब विकास कार्यों के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहित की थी। मई 1977 में प्रशासन ने इसका मुआवजा तय किया। किसानों को ‘चाय’ जमीन के लिए 10,225 रुपये और ‘खाकी’ जमीन के लिए 7,570 रुपये प्रति बीघा का भुगतान किया गया। रेफरेंस कोर्ट ने बाद में इस मुआवजे को बढ़ाकर 6 रुपये प्रति वर्ग गज कर दिया। लेकिन किसान इस मामूली रकम से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने अपने हक की आवाज बुलंद करते हुए मई 1982 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। राम करण और अन्य किसानों ने यह पहली अपील दाखिल कर न्याय की गुहार लगाई थी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने दिखाई नई राह
अदालत में किसानों के वकील ने एक बेहद मजबूत कानूनी दलील पेश की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 2022 के एक अहम फैसले का जिक्र किया। यह मामला अजय पाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 28.12 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से मुआवजा देने का स्पष्ट आदेश पारित किया था। किसानों के वकीलों ने अदालत से मांग की कि मोरना गांव के भूमि अधिग्रहण में भी यही दर लागू होनी चाहिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया। जस्टिस संदीप जैन की सिंगल बेंच ने सभी तथ्यों को परखने के बाद किसानों के पक्ष में यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
मुआवजे के साथ ब्याज और शर्तों का गणित
अदालत ने इस फैसले में कुछ जरूरी नियम और शर्तें भी तय की हैं। कलेक्टर और रेफरेंस कोर्ट का पुराना फैसला 30 अप्रैल 1982 से पहले का था। इसलिए किसानों को 1984 के संशोधित अधिनियम के तहत 30% अतिरिक्त मुआवजा यानी सोलेशियम नहीं मिलेगा। किसान सिर्फ 15% की दर से ही यह अतिरिक्त मुआवजा पाने के हकदार माने गए हैं। इसके अलावा उन्हें बढ़ी हुई राशि पर सालाना 6% की दर से ब्याज भी दिया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट फीस जमा करने में हुई देरी के कारण 20 मई 1982 से 13 जुलाई 1983 तक का ब्याज किसानों को नहीं मिलेगा। इन मामूली शर्तों के बावजूद यह फैसला पीढ़ियों से न्याय की आस लगाए बैठे किसानों के लिए एक बहुत बड़ी राहत है।


